खेत-खलियान

जब सोच बदली, तब मिट्टी ने सोना उगला

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जैविक खेती से दो एकड़ में लाखों की कमाई, भटकुंड के रघुवीरसिंह बघेल बने मिसाल

भौंरासा/सोनकच्छ (मनोज शुक्ला)। कहते हैं अगर सोच साफ हो, मेहनत सच्ची हो और धैर्य बना रहे तो खेती भी किस्मत बदल सकती है। आज जब रासायनिक खेती बढ़ती लागत, घटती पैदावार और बिगड़ते स्वास्थ्य का कारण बनती जा रही है, ऐसे समय में सोनकच्छ के भटकुंड गांव से एक किसान की कहानी उम्मीद की नई फसल बनकर उभरी है। किसान ने जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाकर यह साबित कर दिया कि खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सही तरीके से की जाए तो यह समृद्धि की राह बन सकती है।

भटकुंड गांव के रघुवीरसिंह बघेल जिला पंचायत के उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ वे एक प्रगतिशील और दूरदर्शी किसान भी हैं। करीब छह साल पहले उनके पिता, पूर्व विधायक ठाकुर राजेंद्रसिंह बघेल ने उन्हें पारंपरिक रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने की सलाह दी थी। यही सलाह उनके जीवन और खेती दोनों का टर्निंग पॉइंट बन गई।

रघुवीरसिंह बघेल ने अपनी जमीन के एक हिस्से में अमरूद का बगीचा विकसित किया। उस समय जब अधिकांश किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर थे, तब उन्होंने देसी तरीकों, गोबर की खाद और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे खेती शुरू की। आज वही अमरूद का बगीचा बिना ज्यादा खर्च के हर साल लाखों रुपये की आमदनी दे रहा है।

उनके बगीचे में रेड डायमंड, ब्लैक डायमंड और थाई पिंक जैसी उन्नत किस्मों के अमरूद लगे हैं। खास बात यह है कि एक ही पेड़ से साल में तीन बार फल आते हैं और हर बार 40 से 50 किलो तक उत्पादन होता है। शुरुआत में जहां पैदावार 10620 किलो तक सीमित थी, वहीं आज यह रोजाना डेढ़ से दो क्विंटल तक पहुंच चुकी है। करीब एक महीने तक लगातार तुड़ाई होती है।

एक जमीन, दोहरा फायदा- यही है सफलता का मॉडल

रघुवीरसिंह बघेल ने खेती में नवाचार करते हुए एक ही जमीन से दो तरह का लाभ लेने का मॉडल अपनाया। अमरूद के पेड़ों के बीच खाली जगह में गेहूं, आलू, प्याज और चने की फसल बोते हैं। यानी फल भी और अनाज भी- दोनों से आमदनी। सिर्फ दो एकड़ जमीन से अमरूद की खेती में पिछले तीन-चार वर्षों से हर साल 2 से 3 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। इसके अलावा बीच की जमीन से गेहूं और अन्य फसलों की आय अलग से मिलती है।

कम लागत, स्थायी खेती और ज्यादा मुनाफा

श्री बघेल बताते हैं कि फलदार पौधों में पहले एक-दो साल मेहनत अधिक करनी पड़ती है, लेकिन उसके बाद खर्च बेहद कम हो जाता है। केवल सिंचाई और साल में एक-दो बार गोबर की खाद डालना पर्याप्त होता है। खर्च सिर्फ तुड़ाई और मंडी तक परिवहन का रह जाता है। वे कहते हैं, “जहां गेहूं से मुश्किल से 70-80 हजार रुपये की आमदनी होती है, वहीं फलोद्यान खेती बिना बड़ी लागत के कहीं ज्यादा फायदा देती है।”

उनके पास करीब 25 एकड़ जमीन है, जहां पूरी तरह स्थायी जैविक खेती की जा रही है। खेतों में अमरूद और नींबू के पेड़ों के साथ-साथ गेहूं और आलू की फसल भी ली जाती है। खाद के लिए घर में गायें हैं, जिनके गोबर से पंचगव्य, जीवामृत, निर्मास्त्र और केंचुआ खाद तैयार की जाती है। इन्हीं जैविक उपायों से फसल को पोषण और कीट नियंत्रण किया जाता है।

किसानों के लिए संदेश-

श्री बघेल का कहना है कि आज की सबसे बड़ी जरूरत जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाने की है। रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से न केवल जमीन की उर्वरता खत्म हो रही है, बल्कि मानव स्वास्थ्य भी गंभीर खतरे में है। वे जिले के किसानों से अपील करते हैं कि परंपरागत खेती के साथ-साथ जैविक खेती को भी अपनाएं। कम लागत में भी लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं और खेती को सच मायनों में लाभ का धंधा बनाया जा सकता है।

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