खेतों में लहलहा रही राई-सरसों की फसल

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। क्षेत्र में इस रबी सीजन में खेतों की तस्वीर कुछ बदली-बदली नजर आ रही है। गेहूं और चने के साथ-साथ अब राई-सरसों की पीली चादर ओढ़े खेत दूर-दूर तक दिखाई दे रहे हैं। हवा के झोंकों के साथ लहराती सरसों की फसल न केवल गांव की सुंदरता बढ़ा रही है, बल्कि किसानों के लिए अच्छे उत्पादन और आय की उम्मीद भी जगा रही है।
गेहूं-चना से हटकर राई-सरसों की ओर झुकाव-
इस बार कई किसानों ने पारंपरिक फसलों के साथ राई-सरसों की खेती को प्राथमिकता दी है। इसकी प्रमुख वजह कम लागत में बेहतर उत्पादन और बाजार में इसकी स्थिर मांग बताई जा रही है। किसानों का कहना है कि बदलते मौसम और सिंचाई की सीमित उपलब्धता को देखते हुए राई-सरसों एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरी है।
कम लागत, ज्यादा लाभ-
वरिष्ठ किसान सिद्धनाथ संवनेर, भोजराज दांगी, रामचंद्र दांगी, पवन पाटीदार, सूरज सिंह पाटीदार और शोभाराम मालवीय ने बताया कि मात्र 3 किलो राई के बीज से 1 हेक्टेयर में फसल तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर 10 से 12 क्विंटल तक उत्पादन मिलने की संभावना रहती है। सिंचाई और खाद पर खर्च अपेक्षाकृत कम आता है, जिससे किसानों की लागत घटती है।
मौसम और पानी ने दिया साथ-
किसानों के अनुसार इस वर्ष अनुकूल मौसम ने फसल को मजबूती दी है। ठंड के मौसम में सरसों की बढ़वार अच्छी हो रही है, जिससे फूल भरपूर विकसित हो रहे हैं। यदि मौसम इसी तरह अनुकूल रहा, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर रहने की उम्मीद है।
घर की जरूरतें भी, बाजार से कमाई भी-
राई-सरसों की खेती से किसान अपने घर के लिए तेल की जरूरत पूरी कर लेते हैं, वहीं अतिरिक्त उपज बाजार में बेचकर अच्छी आमदनी भी अर्जित करते हैं। किसानों का कहना है कि यदि बाजार भाव ठीक रहा, तो यह फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगी। पीले फूलों से सजे खेत न केवल किसानों की मेहनत की कहानी कह रहे हैं, बल्कि गांवों में एक नई रौनक भी ला रहे हैं।




