साहित्य

पद्मश्री कालूराम बामनिया ने दी कबीर लोक गीतों की प्रस्तुति

Share

कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा क्षिप्रा नदी घाट, क्षिप्रा पर गूंजे लोक गीत, लोक गायन सुन मंत्रमुग्ध हुए श्रोता

मन लाग्यों मेरो यार फकीरी में…, मन मस्त हुआ रे क्या बोले…, चदरिया झिनी रे झिनी… गीतों की प्रस्तुति दी

देवास। पुण्य सलिला क्षिप्रा नदी के पावन तट, क्षिप्रा पर कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा आयोजित लोक गायन प्रस्तुति कार्यक्रम में लोक संगीत की मधुर स्वर-लहरियों ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिरस, अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना से सराबोर कर दिया। क्षिप्रा नदी घाट, क्षिप्रा पर आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे, जो लोक गायन की प्रस्तुति सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए।

कार्यक्रम में पद्मश्री सम्मानित लोकगायक कालूराम बामनिया ने संत कबीर के अमर पदों की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। उनकी सशक्त और आत्मिक गायन शैली ने श्रोताओं को लोक परंपरा की गहराइयों से जोड़ दिया। “मन लाग्यों मेरो यार फकीरी में”, “मन मस्त हुआ रे क्या बोले”, “चदरिया झिनी रे झिनी” जैसे कबीर पदों की प्रस्तुति पर श्रोता झूम उठे और पूरा घाट कबीर वाणी से गूंज उठा। इन गीतों के माध्यम से संत कबीर के वैराग्य, मानवता, सत्य और आत्मबोध के संदेश श्रोताओं तक प्रभावी रूप से पहुंचे।

लोक गायन की इस प्रस्तुति ने न केवल सांस्कृतिक आनंद प्रदान किया, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की समृद्ध विरासत को सहेजने का संदेश भी दिया। कार्यक्रम के दौरान क्षिप्रा नदी के पवित्र स्वरूप और उसके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया गया। आयोजकों ने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं।

कलाव्योम फाउंडेशन के अध्यक्ष अशोक श्रीमाल ने अपने संबोधन में कहा कि क्षिप्रा नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है। इसके संरक्षण और स्वच्छता के प्रति जनजागरूकता फैलाना समय की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा क्षिप्रा नदी संरक्षण के संदेश के साथ हर माह सांस्कृतिक आयोजन किए जाएंगे, ताकि कला, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ा जा सके।

वहीं फाउंडेशन की सचिव अपर्णा भोसले ने कहा कि लोक संगीत हमारी सांस्कृतिक आत्मा है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को लोक कला से जोड़ना और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना कलाव्योम का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि भविष्य में लोक गायन, नृत्य, नाट्य और साहित्य से जुड़े विविध कार्यक्रमों का आयोजन क्षिप्रा तट पर किया जाएगा।

कार्यक्रम के दौरान घाट पर उपस्थित श्रोताओं ने लोक गायन की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन मानसिक शांति प्रदान करते हैं और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। कई श्रोताओं ने कबीर पदों की प्रस्तुति को भाव-विभोर कर देने वाला बताया।

समापन अवसर पर कलाकारों का सम्मान किया गया और क्षिप्रा नदी को स्वच्छ व संरक्षित रखने का सामूहिक संकल्प लिया गया। लोक संस्कृति और नदी संरक्षण के इस अनूठे संगम ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया।

Back to top button