खेत-खलियान

टमाटर के गिरते भाव से किसान बेहाल, लागत निकालना भी मुश्किल

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– मंडी में टमाटर 3 रुपए किलो, किसान बोले- लागत तो दूर, भाड़ा भी नहीं निकल रहा!

देवास। टमाटर के दामों में आई भारी गिरावट से किसान बेहाल हैं। कुछ महीने पहले तक जो टमाटर 40 रुपए किलो तक बिक रहा था, वह खैरची में अब केवल 8-10 रुपए प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है। किसानों का कहना है कि इस दाम पर टमाटर बेचना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। कई खेतों पर किसान लागत भी नहीं निकाल पा रहे, जिससे वे फसल को खेत में ही छोड़ने पर मजबूर हैं।

लागत अधिक, कमाई नहीं- देवास के मेंढकी धाकड़ के किसान जगदीश नागर ने बताया, कि उन्होंने आठ बीघा में टमाटर की फसल लगाई है, लेकिन अब उन्हें मंडी में केवल 2 से 3 रुपए प्रति किलो का भाव मिल रहा है। इससे लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।कई किसानों का कहना यदि इसी तरह भाव गिरते रहे तो अगले सीजन में वे टमाटर की खेती नहीं करेंगे।

अगर एक बीघा में टमाटर उगाने की लागत की बात करें तो-

पौधों की कीमत: 12,000 रुपए
मल्चिंग खर्च: 8,000 रुपए
ड्रिप, पाइप व अन्य खर्च: 18,000 रुपए
मजदूरी खर्च: 25,000 रुपए
टमाटर के पौधों को सहारा देने के लिए बांस, तार व सूतली का खर्च: 45,000 रुपए
कीटनाशक और खाद: 50,000 रुपए।
मंडी तक ले जाने का भाड़ा व मंडी कमीशन आदि खर्च।

इस प्रकार एक बीघा में टमाटर की कुल लागत पौने दो लाख रुपए से अधिक हो जाती है। दूसरी ओर, उत्पादन लगभग 200 से 250 क्विंटल प्रति बीघा होता है, लेकिन यदि मौसम प्रतिकूल हो तो यह उत्पादन घट भी सकता है।

टमाटर की किस्म और जलवायु-
कृषक राजेश नागर ने बताया, कि टमाटर की खेती के लिए गर्म और समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। यह फसल ठंड में अच्छे से विकसित होती है लेकिन ज्यादा गर्मी और बारिश में नुकसान भी उठाना पड़ता है। सामान्यतः सितंबर-अक्टूबर में बुआई की जाती है और फरवरी से अप्रैल के टमाटर तोड़े जाते हैं।

टमाटर की कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं-
अर्का विकास: यह जल्दी पकने वाली किस्म है और इसकी उपज अधिक होती है।
अर्का सम्राट: यह अधिक उत्पादन देने वाली संकर प्रजाति है।
स्वर्ण प्रजाति: यह आकार में बड़े टमाटर देती है और बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।

क्यों गिरे दाम?
किसानों के अनुसार, इस बार टमाटर की पैदावार अधिक हुई है, जिससे मंडियों में टमाटर की आपूर्ति ज्यादा हो गई। वहीं, अन्य राज्यों से भी टमाटर की आवक बढ़ने से स्थानीय किसानों को अच्छे दाम नहीं मिल पा रहे हैं।

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