धर्म-अध्यात्म

सत्य को उपलब्ध होने वाला कभी दुखी नहीं हो सकता- सद्गुरु मंगल नाम साहेब

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देवास। सुख का सागर हमारे भीतर ही है, जो नासिका के स्वर के साथ हर पल बह रहा है। सांसों की प्रत्येक लहर सुखदायी है। जो साधक इस श्वास-लहर में बह जाता है, वह जीवन में कभी दुखी नहीं हो सकता।

यह प्रेरक विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सद्गुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली, चूना खदान बालगढ़ पर गुरु-शिष्य चर्चा और गुरुवाणी पाठ के दौरान व्यक्त किए।

कल्पनाओं से परे ही मिलता है सच्चा सुख-
सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने कहा, कि मन की कल्पनाओं को हटा दो, तो आदमी कभी दुखी नहीं हो सकता। जीव व्यापक है, बस समझ की गहराई में उतरना होगा। जब तक ‘मेरा-तेरा’ की संकीर्ण सोच में फंसे रहेंगे, सुख नहीं मिलेगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जितना खाकर हजम कर लें, वही वास्तव में हमारा है। दुनिया सारी दौलत, सत्ता और राजपाट भी दे दे, तो भी सुख प्राप्त नहीं होता। क्योंकि तन की भूख ढाई पाव है, पर मन की भूख अनंत है।

मृत्यु केवल भ्रम है-
सद्गुरु ने कहा, कि हम मर-मर कहते हैं, लेकिन आज तक कोई मरा नहीं। केवल देह उत्पन्न होती है और नष्ट हो जाती है, आत्मा अजर-अमर है। हजारों साल पहले जो चेतना थी, वही आज भी विद्यमान है। ‘आद हता सो अब है संतो, फेर-फार कछु नाही। उपजे, खपे देह हमारी, जीव अमर जग माही। उन्होंने स्पष्ट किया कि मृत्यु का भाव झूठा पाठ है, जबकि श्वास के साथ चलने वाला जीव कभी समाप्त नहीं होता।

हंस और बगुले का उदाहरण-
सद्गुरु ने समुद्र तट पर रहने वाले हंस और बगुले का उदाहरण देते हुए कहा, कि दोनों एक ही स्थान पर रहते हैं। लेकिन हंस मोती चुनता है और बगुला मछली। इसी तरह शिष्य को भी विवेक से चयन करना चाहिए। जो शिष्य सद्गुरु की वाणी को आत्मसात कर लेता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।

समझ ही सच्चा घर-
उन्होंने कहा कि जीवन का मूल सार समझ है। जब हम यह स्वीकार कर लें कि यह तन भी हमारा नहीं है, तो बाकी किसी भी वस्तु पर ‘मेरा’ का अधिकार कैसे हो सकता है। “समझ के घर में प्रवेश करना ही मोक्ष का मार्ग है।”

इस अवसर पर सेवक वीरेंद्र चौहान ने कार्यक्रम की जानकारी दी और बताया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुरुवाणी सुनने पहुंचे।

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