श्राद्ध पक्ष क्या है? जानिए इसके रहस्य और परंपरा

क्यों कहलाता है यह काल “पितृ पक्ष”?
पूर्वजों को तृप्त करने का अद्भुत अवसर
पितृ ऋण से मुक्ति का सर्वोत्तम साधन
हिन्दू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक का समय पितृ पक्ष अथवा श्राद्ध पक्ष कहलाता है। इस पखवाड़े में अपने पितरों को स्मरण कर तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। यह काल पितृ ऋण से मुक्ति पाने और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति का श्रेष्ठ अवसर माना गया है।
श्राद्ध पक्ष का आरंभ और अवधि-
श्राद्ध पक्ष का आरंभ भाद्रपद पूर्णिमा से होता है और अमावस्या तक चलता है। इसे पितृ पक्ष, महालय, श्राद्ध पखवाड़ा आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रत्येक तिथि को उसी तिथि पर दिवंगत हुए पूर्वज का श्राद्ध किया जाता है।
श्राद्ध कर्म की महत्ता-
पितृ ऋण से मुक्ति – हिन्दू शास्त्रों में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का उल्लेख मिलता है। श्राद्ध करना पितृ ऋण चुकाने का सबसे बड़ा साधन है।
पितरों की तृप्ति – तर्पण और पिंडदान से पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है।
आशीर्वाद की प्राप्ति- पूर्वज प्रसन्न होकर वंशजों को समृद्धि, सुख और संतति का आशीर्वाद देते हैं।
धार्मिक और सामाजिक महत्व- श्राद्ध केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि कृतज्ञता और पारिवारिक संस्कारों का प्रतीक है।
श्राद्ध कर्म की मुख्य विधियां-
तर्पण- जल, तिल और कुश के माध्यम से पितरों को अर्पण करना।
पिंडदान- चावल, तिल और घी से बने पिंड अर्पित कर पितरों की आत्मा को तृप्त करना।
श्राद्ध भोज- ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन कराना और दान देना।
स्मरण व नाम जप- पूर्वजों के नाम से पूजा, मंत्रोच्चारण और हवन करना।
पितृ पक्ष से जुड़े नियम और मान्यताएं-
श्राद्ध काल में शुभ कार्य (जैसे विवाह, गृहप्रवेश आदि) वर्जित माने जाते हैं।
सात्विक भोजन, संयमित आचरण और नियमपालन आवश्यक है।
कहा जाता है कि इस समय पितरों की आत्माएं धरती पर आती हैं और अपने वंशजों के अर्पण से तृप्त होकर आशीर्वाद देती हैं।
वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण-
श्राद्ध पक्ष हमें पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देता है।
यह परंपरा परिवार में स्मरण, एकता और संस्कारों को बनाए रखने का माध्यम है।
तर्पण और दान से समाज में जरूरतमंदों की सहायता होती है।
हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण का पर्व है। इस पखवाड़े में की गई श्रद्धापूर्ण आहुति पितरों की आत्मा को शांति देती है और वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। अतः श्राद्ध पक्ष का पालन प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्म, कर्तव्य और संस्कार का प्रतीक है।




