सच्ची सेवा वही, जो आत्मा को दुख और पीड़ा से मुक्त करे : प्रेमलता दीदी

देवास। मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल स्वयं सुखी रहना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सुख, शांति और आशा का संचार करना है। सेवा तभी सार्थक बनती है जब वह किसी पीड़ित आत्मा के जीवन में राहत और सकारात्मक परिवर्तन लाए। निस्वार्थ भाव, पवित्र मन और करुणा से किया गया कार्य ही ईश्वर की सच्ची सेवा कहलाता है।
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इन्हीं प्रेरणादायी विचारों के साथ प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के कालानी बाग सेंटर पर योग शिक्षिका अर्चना शर्मा का ब्रह्माकुमारी प्रेमलता दीदी के सानिध्य में पुष्पमालाओं से सम्मान किया गया। इस अवसर पर उन्हें भगवान नारायण की तस्वीर भेंट कर अभिनंदन किया गया।
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अपने अमृतवचनों में ब्रह्माकुमारी प्रेमलता दीदी ने कहा कि सेवाएं अनेक प्रकार की होती हैं, लेकिन सबसे ऊंची सेवा मनुष्य आत्माओं को दुखों और पीड़ाओं से मुक्त करना है। ऐसा सेवा कार्य करना चाहिए जिससे व्यक्ति सदा के लिए सुखी बन सके। आज के समय में इस प्रकार की आध्यात्मिक सेवा की समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है।
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उन्होंने कहा कि समाज सेवा वास्तव में हमारा नैतिक कर्तव्य है। सेवा का आधार पवित्र मन और निस्वार्थ भावना होती है, इसलिए सेवा हमेशा समर्पण और लगन के साथ करनी चाहिए। जिस सेवा से दूसरों को सुख और शांति मिलती है, वही सेवा वास्तव में सेवा कहलाने योग्य होती है। यदि मन में पवित्रता और सेवा भाव का अभाव है तो की गई सेवा का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता।
इस अवसर पर ब्रह्माकुमारी अपुलश्री दीदी, हेमा वर्मा बहन, विवेक भाई, एकता बहन, राम भाई सहित केंद्र से जुड़े अनेक भाई-बहन उपस्थित रहे।




