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साबूदाना आखिर बनता किस चीज से है? जानिए खेत से लेकर मोती जैसे दानों तक की पूरी कहानी

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News desk | News one click.
उपवास में सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले खाद्य पदार्थों में साबूदाना शामिल है। साबूदाना खिचड़ी हो, वड़ा हो या फिर मीठी खीर—व्रत के दौरान इसकी मांग बढ़ जाती है। सफेद और गोल दिखाई देने वाले इन छोटे-छोटे दानों को देखकर अक्सर मन में सवाल आता है कि आखिर साबूदाना किसी पेड़ पर उगता है या खेत में इसकी फसल होती है?

अगर आप भी इसे किसी अनाज या बीज से बनने वाला खाद्य पदार्थ समझते हैं, तो इसकी असली कहानी काफी दिलचस्प है।

साबूदाना वास्तव में एक स्टार्च उत्पाद है, जो आमतौर पर कसावा (Cassava) की जड़ से तैयार किया जाता है। कसावा को कई जगह टैपिओका के नाम से भी जाना जाता है।

जमीन के अंदर छिपी होती है इसकी असली शुरुआत: साबूदाने का सफर किसी दाने से नहीं, बल्कि जमीन के अंदर उगने वाली कसावा की जड़ से शुरू होता है। कसावा एक कंद वाली फसल है। इसकी मोटी जड़ में काफी मात्रा में स्टार्च जमा होता है। जब फसल तैयार हो जाती है तो इन जड़ों को जमीन से निकालकर प्रसंस्करण के लिए भेजा जाता है।

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सबसे पहले जड़ों की सफाई की जाती है। उन पर लगी मिट्टी और दूसरी बाहरी अशुद्धियों को हटाने के बाद उन्हें छीलकर छोटे टुकड़ों में तैयार किया जाता है। इसके बाद असली काम शुरू होता है।

जड़ से निकाला जाता है स्टार्च: कसावा के टुकड़ों को मशीनों की सहायता से पीसा जाता है। इसमें पानी मिलाकर जड़ के अंदर मौजूद स्टार्च को अलग किया जाता है।

इस प्रक्रिया के दौरान स्टार्च पानी के साथ मिलकर एक तरह का सफेद या दूधिया मिश्रण बना देता है। बाद में इसे अलग करके साफ किया जाता है और अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता है। यही स्टार्च आगे चलकर साबूदाने का रूप लेता है।

सफेद मोती कैसे बन जाते हैं? साबूदाने की सबसे खास पहचान उसके गोल-गोल सफेद दाने हैं। लेकिन कसावा की जड़ से निकला स्टार्च सीधे इन मोतियों जैसा नहीं होता।

प्रसंस्करण के दौरान स्टार्च को नियंत्रित नमी और तापमान के साथ तैयार किया जाता है। विशेष मशीनों के जरिए इसे छोटे-छोटे गोल दानों का आकार दिया जाता है।

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इसके बाद इन दानों को सुखाया जाता है और आवश्यक प्रसंस्करण के बाद पैकिंग के लिए तैयार किया जाता है। इस तरह जमीन के अंदर मौजूद कसावा की जड़ धीरे-धीरे बदलते हुए हमारी रसोई तक पहुंचने वाले साबूदाने में बदल जाती है।

साबूदाना अनाज नहीं है: यह बात जानना भी दिलचस्प है कि साबूदाना गेहूं, चावल, मक्का या किसी दूसरे अनाज का दाना नहीं है। इसकी तुलना चावल या किसी अनाज से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इसका मूल स्रोत कसावा की जड़ में मौजूद स्टार्च है।

इसी वजह से उपवास के दौरान इसका इस्तेमाल लंबे समय से लोकप्रिय रहा है। हालांकि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में व्रत के खाद्य पदार्थों के नियम अलग हो सकते हैं।

सागो और साबूदाना में अंतर: एक और भ्रम अक्सर साबूदाने को लेकर रहता है। सागो शब्द का इस्तेमाल मूल रूप से कुछ खास ताड़ जैसी प्रजातियों से प्राप्त स्टार्च के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, भारत में बाजार में मिलने वाला सामान्य साबूदाना मुख्य रूप से कसावा से प्राप्त टैपिओका स्टार्च से बनाया जाता है। यानी हर सफेद गोल दाने को देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि वह किसी पौधे का बीज है।

पकाने के बाद पारदर्शी दिखता है साबूदाना: कच्चा साबूदाना सफेद और कुछ हद तक अपारदर्शी दिखाई देता है। लेकिन इसे पानी में भिगोने और फिर पकाने के बाद इसके दाने नरम और हल्के पारदर्शी नजर आने लगते हैं।

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इसका संबंध इसके अंदर मौजूद स्टार्च से है। पानी और गर्मी मिलने पर स्टार्च की संरचना में बदलाव आता है। इसी वजह से साबूदाने की बनावट और उसका रूप बदल जाता है।

यही परिवर्तन पकने के बाद साबूदाने को वह खास नरम और चिपचिपी बनावट देता है, जो खिचड़ी और वड़े में दिखाई देती है।

उपवास में लोकप्रिय है साबूदाना: साबूदाना मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट और स्टार्च प्रदान करता है। इसलिए इससे शरीर को ऊर्जा मिल सकती है। उपवास के दौरान जब भोजन के विकल्प सीमित होते हैं, तब साबूदाना आसानी से तैयार होने वाला लोकप्रिय विकल्प बन जाता है।

हालांकि केवल साबूदाने को संपूर्ण पौष्टिक भोजन मानना सही नहीं होगा। इसे मूंगफली, दूध, दही या अन्य उपयुक्त खाद्य पदार्थों के साथ लेने से भोजन में पोषण का संतुलन बेहतर किया जा सकता है।

खेत से थाली तक ऐसे पहुंचता है साबूदाना: अगर पूरी प्रक्रिया को बेहद आसान भाषा में समझें तो साबूदाने का सफर कुछ ऐसा है— कसावा की जड़ → सफाई → पिसाई → स्टार्च अलग करना → स्टार्च की प्रोसेसिंग → गोल दाने बनाना → सुखाना → पैकिंग → आपकी रसोई।

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इसलिए अगली बार जब आपके सामने साबूदाना खिचड़ी की प्लेट आए तो उसके छोटे-छोटे सफेद दानों को सिर्फ व्रत का भोजन न समझें। इन दानों के पीछे जमीन के अंदर उगने वाली कसावा की जड़ से शुरू होने वाली एक पूरी खाद्य-प्रसंस्करण प्रक्रिया छिपी है।

और शायद यही साबूदाने की सबसे दिलचस्प बात है—जो चीज हमें किसी छोटे सफेद मोती जैसी दिखाई देती है, उसकी शुरुआत वास्तव में मिट्टी के नीचे छिपी एक जड़ से होती है।

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