भक्ति के साथ निष्ठा व ईमानदारी से कर्म आवश्यक- आचार्य देवराज शर्मा

श्रीराम कथा में प्रभु श्रीराम के वनवास का प्रसंग सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
देवास। भक्ति के साथ कर्म और निष्ठा के साथ परिश्रम यही जीवन का मूल मंत्र है। जो व्यक्ति केवल भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, उसे सफलता नहीं मिलती। मनुष्य को सदैव कर्मप्रधान रहना चाहिए। कर्म ईमानदारी और निष्ठा से किए जाएं तो जीवन स्वयं सही दिशा में आगे बढ़ता है।
यह विचार श्री सूर्य विजय हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान आचार्य पं. देवराज शर्मा ने व्यक्त किए। आचार्य पं. शर्मा ने समाज में व्याप्त जाति प्रथा पर अपने विचार रखते हुए कहा कि प्राचीन काल में जाति प्रथा का अस्तित्व नहीं था और हमारे धर्मग्रंथों में भी इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। समाज की मजबूती के लिए एकता और संगठन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में कोई खालीपन महसूस हो रहा हो तो प्रभु श्रीराम को अपना मान लें, वह शून्यता स्वयं दूर हो जाएगी। मित्र राम जैसे हों, शत्रु भी राम जैसे हों, बेटा राम जैसा हो और पति भी राम जैसा, यही आदर्श जीवन की परिकल्पना है।
बुधवार को श्रीराम कथा में भगवान श्रीराम के वनवास प्रसंग का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया गया। आचार्य श्री ने बताया कि भगवान राम ने बाल्यकाल में अपनी तोतली भाषा में माता कैकयी से वनवास का वचन मांग लिया था। उसी वचन के पालन में माता कैकयी ने राजा दशरथ से राम का वनवास मांगा। इस प्रसंग को सुनकर कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। भजनों के दौरान भक्त भावविभोर होकर झूम उठे।

आरती के समय महापौर गीता अग्रवाल, महापौर प्रतिनिधि दुर्गेश अग्रवाल, भाजपा नेता गणेश पटेल, धर्मेंद्र सिंह बैस, मनीष सोलंकी, शेखर कौशल, अतुल बागलीकर, भजन मंडल की वीणा कानूनगो, शैलू दुबे, सपना महाजन, शोभा महाजन, मोड़ समाज से दामोदर गुप्ता सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम की जानकारी महिला मंडल की विनिता व्यास ने दी।




