धर्म-अध्यात्म

मैं’ और ‘तू’ की सीमा मिटे तो हर देह में दिखेगा हरि: सद्गुरु मंगल नाम साहेब

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देवास। “सांस ही हरि है… यही वह चेतना है, जो संसार की प्रत्येक देह को जीवंत बनाए हुए है। जब ‘मैं’ और ‘तू’ की दीवार मिट जाती है, तब हर देह में वही हरि दिखाई देने लगता है।” अपने ‘मैं’ के भाव को समझो। मैं कौन हूं? मैं तेरे अंदर हूं और तू मेरे अंदर है। यह नहीं कि मैं अलग हूं और तू अलग है।” मनुष्य को स्वयं केवल अपने भीतर नहीं, बल्कि हर प्राणी के भीतर देखना चाहिए।

सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने यह संदेश सद्गुरु कबीर सरवर प्रार्थना स्थल, चूना खदान बालगढ़ में आयोजित गुरु-शिष्य संवाद एवं गुरुवाणी पाठ के दौरान दिया। सद्गुरु ने कहा कि मनुष्य को केवल अपने भीतर ही नहीं, बल्कि हर प्राणी के भीतर उसी चेतना का अनुभव करना चाहिए। उन्होंने समझाया कि सद्गुरु किसी एक स्थान या शरीर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ‘सकल भवन के वासी’ हैं। यहां भवन का अर्थ शरीर से है। संसार में जितनी भी देह हैं, उन सभी में वही चेतना और प्रत्येक श्वास में उसी हरि का वास है।

अहंकार का नशा चढ़ता भी है और उतरता भी

सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने अहंकार को क्षणिक नशा बताते हुए कहा कि मनुष्य इसी नशे में अपनी सबसे बड़ी शक्ति श्वास रूपी हरि को भूल जाता है। उन्होंने कहा कि दिखावे और अहंकार की ठर्रेबाजी छोड़कर उस श्वास से जुड़ने की जरूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के हर पल हमारे भीतर प्रवाहित हो रही है।

उन्होंने संदेश दिया कि अहंकार-अभिमान को छोड़कर बिना किसी प्याले के उस श्वास को पीना सीखो, जो जीवन का वास्तविक आधार है। उनके अनुसार “मैंने किया” और “यह मेरा है” का भाव ही मनुष्य के दुखों का बड़ा कारण है। अहंकार कुछ समय का है, लेकिन श्वास जीवनभर साथ रहने वाली शक्ति है।

‘मैं’ और ‘तू’ की दीवार ही भटकाव का कारण

सद्गुरु ने कहा कि संसार में मनुष्य ने अपने चारों ओर ‘मैं’ और ‘तू’ की सीमाएं खड़ी कर ली हैं। यही विभाजन उसे सत्य से दूर ले जा रहा है। जिस क्षण व्यक्ति के भीतर से ‘मैं’ का भाव कम होने लगता है, वह दूसरे के दुख को भी अपना दुख समझने लगता है। ऐसी अवस्था में मनुष्य के भीतर केवल एक ही भावना शेष रहती है “सब सुखी रहें।”

कबीर साहेब के वचन का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही।”

उन्होंने कहा कि जब ‘मैं’ हट जाता है, तब चारों ओर हरि ही हरि दिखाई देता है। हरि अनंत है। तुम्हारे भीतर भी वही श्वास प्रवाहित हो रही है और मेरे भीतर भी वही श्वास चल रही है।

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हर शहर, हर समय और हर देह में उपलब्ध है श्वास

सद्गुरु ने कहा कि श्वास किसी व्यक्ति, स्थान या समय की मोहताज नहीं है। शहर कोई भी हो, स्थान कोई भी हो, दिन हो या रात—श्वास हर जगह और हर समय सहज उपलब्ध है। जरूरत केवल इस सहज सत्य को पहचानने की है। उन्होंने कहा कि संयम और नाम को जीवन का हिस्सा बना लिया जाए तो मनुष्य अनेक दुखों से पार पा सकता है।

साध संगत ने लिया संदेश को जीवन में उतारने का संकल्प

कार्यक्रम के दौरान साध संगत ने सद्गुरु मंगल नाम साहेब को नारियल भेंट कर एवं पुष्पमालाओं से सम्मानित किया। श्रद्धालुओं ने उनका आशीर्वचन प्राप्त किया और गुरु-वाणी के संदेश को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की सहभागिता रही। कार्यक्रम संबंधी जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

जो सुरगुरु का उपासक होता है, वह ब्रह्मांड को जान लेता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब 

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