परिस्थितियों को नहीं, स्वयं को मजबूत बनाइए, सफलता अपने-आप रास्ता बना लेगी

मनुष्य का जीवन ठहराव के लिए नहीं, निरंतर प्रगति के लिए
पानी का जहाज़ लंगर पर खड़ा रहने के लिए नहीं बना,
हवाई जहाज़ हवाई अड्डे पर स्थिर रहने के लिए नहीं बना, ट्रेन स्टेशन पर और बस बस-स्टैंड पर खड़े रहने के लिए नहीं बनीं।
इन सभी का अस्तित्व चलने, उड़ने और आगे बढ़ने में है। ठीक उसी तरह, मनुष्य का जीवन भी ठहराव के लिए नहीं, निरंतर प्रगति के लिए है।
यदि कोई व्यक्ति सड़क पर खड़े होकर यह सोचता रहे कि “जब सड़क पूरी तरह खाली होगी, तभी मैं आगे बढ़ूँगा” तो यकीन मानिए, वह वहीं खड़ा रह जाएगा। क्योंकि जीवन में कभी भी परिस्थितियाँ पूरी तरह अनुकूल नहीं होतीं, हमें ही परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालना पड़ता है।
क्रिकेट का बल्लेबाज़ आती हुई गेंद को नहीं रोकता, वह उसकी गति, दिशा और परिस्थिति को समझकर अपने कौशल के अनुसार शॉट लगाता है और रन बना लेता है। जीवन भी बिल्कुल ऐसा ही खेल है। जो अवसर सामने आए, उसे पहचानिए, समझिए और साहस के साथ कदम बढ़ाइए।
सावधानी आवश्यक है, लेकिन निष्क्रियता नहीं।
सुरक्षित रहिए, पर डर के कारण जड़ मत बनिए।
यदि आप जीवित हैं, तो जीवन में जीवंत दिखाई देना भी जरूरी है। अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग कीजिए, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए – सफलता अवश्य मिलेगी।
डरिए मत… और किसी को डराइए भी मत।
याद रखिए, तैरना तभी सीखा जाता है जब पानी में उतरते हैं। पानी से बाहर खड़े होकर तैरने की कला नहीं सीखी जा सकती। इसी तरह, जीवन की समस्याओं से भागकर नहीं, उनके बीच रास्ता बनाकर ही आगे बढ़ा जाता है। अपने आसपास के वातावरण से सीखिए, हर अनुभव को शिक्षक बनाइए, और अपनी मंज़िल स्वयं तय कीजिए।
या तो आप जीतेंगे और यदि नहीं भी जीते, तो सीखेंगे जरूर। और यह अनुभव किसी भी जीत से कम नहीं होता। अनुभव उम्र से नहीं, कर्म करने से मिलता है। जो जितना अधिक प्रयास करता है, वह उतना ही अधिक निखरता है।
अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दीजिए कि वे स्वावलंबी बनें, डर से नहीं, हौसले से आगे बढ़ें। क्योंकि संघर्ष के आगे जीत निश्चित होती है। अपनी क्षमता को पहचानिए, उसे निखारिए और निरंतर उन्नति की ओर बढ़ते रहिए।
