धर्म-अध्यात्म

साधु वही है जो तत्व, प्रकृति, बल और माया को जीत लेता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब

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देवास। सुरगुरु ने डुबकी मारी तो उसमें अनेक शरीर दिखे क्योंकि इस श्वास की बेलड़ी में अनेक तन लगे हैं। जैसे श्वास के अंदर आदमी कूद गया।। सुरगुरु में डुबकी मारी तो उसमें अनेक देह अंकुरित होती दिखी।

यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली सेवा समिति मंगल मार्ग टेकरी द्वारा आयोजित गुरु-शिष्य चर्चा, गुरुवाणी पाठ में व्यक्त किए। उन्होंने कहा, कि इंद्री घाट जाने पर पाया कि माया संग नहीं चलती है जो संग चलता है वह श्वास ही है। संग चले सो धन है संतों, छूट गई सो माया। आगे कहा कि जो ज्ञान और मर्म के भेद को कंट्रोल कर लेता है उसे दशरथ कहा गया है। जो इंद्रीय स्वाद में लीन है वह दशानन है। जिसने विचारों के घाट पर उतरकर जाना है, जो दर्शन के घाट पर उतरकर तत्व प्रकृति बल और माया को साध लेता है वही साधु हैं। तत्व प्रकृति, बल और माया इनको जीते साधु कहाया।

आगे कहा कि एक समझ की आंखों से देखा है और एक सिर्फ देखा गया। देखत-देखत ऐसा देख की मिट जाए दुविधा और रह जाए एक। जो अजर अमर है, उसको देखो। उसके देखने से नहीं, उसको समझने की जरूरत है। यह समझ आपको सद्गुरु की शरण में जाने से और उनके वाणी विचारों को आत्मसात करने से ही आएगी। इस दौरान सत संगत द्वारा सतगुरु मंगल नाम साहेब की महाआरती कर नारियल भेंट किया। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।

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