श्राद्ध तिथि पर गीता का 7वां व 16वां अध्याय पाठ पूर्वजों की सद्गति का मार्ग प्रशस्त करता है- पं. उपाध्याय

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। श्राद्ध पक्ष का पावन समय चल रहा है। पितृपक्ष के इन दिव्य दिनों में जहां सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व है, वहीं अपने दिवंगत पूर्वजों की तिथि पर श्राद्ध कर्म कर उन्हें स्मरण करना भी जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य माना गया है।
पंडित सुरेश चंद्र उपाध्याय ने बताया, कि श्राद्ध के अवसर पर यदि साधारण पूजन-विधि के साथ गीता का 16वां और 7वां अध्याय श्रद्धा भाव से पाठ कर उनके फल का संकल्प पूर्वजों को समर्पित किया जाए, तो आत्माओं को सद्गति की ओर मार्ग मिलता है। यदि संभव हो तो किसी विद्वान ब्राह्मण से इन अध्यायों का विधिवत पाठ कराकर उनका पुण्य फल दिवंगत आत्माओं को अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से पूर्वज प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-शांति एवं आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा, कि सनातन धर्म ही जीवन के आरंभ से लेकर जीवनोपरांत तक कल्याणकारी उपायों का शाश्वत मार्ग है। गीता का पाठ केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि आत्मा को मुक्तिदायी मार्ग पर अग्रसर करता है। इतिहास में वर्णन है कि 16वें अध्याय का फल गजेंद्र को समर्पित करने पर उसे मोक्ष प्राप्त हुआ तथा 7वें अध्याय का फल एक सर्प योनि में जन्मे व्यापारी को समर्पित करने पर उसकी सद्गति हुई। इसी प्रकार यदि हम भी अपने पूर्वजों के लिए गीता के इन अध्यायों का पुण्य फल समर्पित करें, तो उनकी आत्माएं संतुष्ट होकर भटकाव से मुक्त होती हैं।
पं. उपाध्याय ने कहा, कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग श्राद्ध तिथियों को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण वे पितृ तर्पण और पूजा-पाठ जैसे अनुष्ठानों से विमुख हो गए हैं। यही कारण है कि जीवन में अनचाहे दुःख और कष्ट बढ़ते हैं। उन्होंने कहा, कि पूर्वजों की स्मृति और गीता पाठ का पुण्य अर्पण ही सच्चा श्राद्ध है। यही मार्ग आत्मा को शांति और वंशजों को सुख-समृद्धि की ओर ले जाता है।




