धर्म-अध्यात्म

बुद्धि को विकसित करती है श्रीमद भागवत कथा- पं. शास्त्री

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– राजा परीक्षित के प्रसंग को सुनकर भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

सिरोल्या। जीवन में जीने की अगर कला सीखनी है तो वह सांसारिक जीवन से नहीं मिलेगी। उसके लिए श्रीमद भागवत कथा का रसपान करना होगा। भागवत कथा से मन निर्मल होता है। शरीर में चल रहे दु:खों की पीड़ा समाप्त होती है। साथ ही बुद्धि भी निरंतर विकसित होती है।

ये विचार श्री खाटूश्याम सालासर बालाजी मंदिर नापाखेड़ी में चल रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक भागवताचार्य पं. विष्णुदत्त शास्त्री महाराज ने व्यासपीठ से कहें। उन्होंने राजा परीक्षित संवाद शुकदेव जन्म सहित के प्रसंग भी सुनाए। भागवत के श्लोकों और महाभारत के संस्मरणों के माध्यम से जीवन के मूलभूत सिद्धांतों पर कहा कि मनुष्य को अपने द्वारा अर्जित धन का कम से कम दसवां हिस्सा दान अवश्य करना चाहिए। यह दान केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आत्म शुद्धि और समाज कल्याण का मार्ग भी है। दान व्यक्ति को सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठाकर परोपकार और संतोष की और प्रेरित करता है।

कथा के मध्य उन्होंने भीष्म पितामह के जीवन के प्रसंगों का स्मरण कराया और बताया कि मृत्यु शैय्या पर उन्होंने अपने परिवार और समाज को उपदेश दिया था कि राजा का प्रथम कर्तव्य है कि वह प्रजा का पालन पुत्रवत करें, न्याय और धर्म को सर्वोपरि रखे और अंत में प्रभु भक्ति के बल पर मोक्ष को प्राप्त करे। श्रीकृष्ण के समक्ष भीष्म का देहावसान त्याग, तप, क्षमा और दया का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि अंत समय में भीष्म अपने कर्मों का चिंतन करते हुए स्वयं को दोषमुक्त नहीं मानते, लेकिन भक्ति, सत्य और समर्पण के बल पर श्रीकृष्ण के सम्मुख उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंत में व्यासपीठ की महाआरती हुई एवं महाप्रसादी वितरित की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

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