खेत-खलियान

प्याज में घाटे से टूटा किसानों का हौसला

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पिछले साल के घाटे की टीस अब भी ताजा, 40 प्रतिशत किसानों ने बनाई दूरी

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। कभी किसानों की किस्मत बदलने वाली प्याज की फसल इस बार खुद किसानों की आंखों की किरकिरी बन गई है। बीते वर्ष हुए भारी नुकसान की टीस अब भी मन में है। इसी कारण क्षेत्र के किसान इस बार प्याज की खेती से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि जहां एक समय हर खेत में प्याज की हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब आलू व अन्य कम अवधि की फसलें लहलहा रही हैं। आंकड़ों की मानें तो इस वर्ष प्याज बोने वाले किसानों की संख्या में करीब 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

प्याज उत्पादक किसान श्रीराम पाटीदार बताते हैं कि यह ऐसी फसल है जिसमें मेहनत तो छह महीने की लगती है, लेकिन मुनाफा बाजार पर निर्भर करता है। अक्टूबर में कण (बीज) बोया जाता है, दो माह बाद रोपाई होती है। इसके बाद सिंचाई, खाद, दवा, निराई-गुड़ाई पर लगातार खर्च होता है। यदि मौसम जरा भी बिगड़ा या रोग लग गया तो पूरी मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। उन्होंने कहा कि कई बार तो अंकुरण भी ठीक से नहीं होता, ऐसे में किसानों को दोबारा बाजार से पौध खरीदकर खेत में लगाना पड़ता है, जिससे लागत और बढ़ जाती है।

मेहनत बहुत, मुनाफा अनिश्चित

चार से पांच महीने तक निरंतर देखभाल के बाद जब फसल तैयार होती है, तब 15 दिन तक भट्टी लगाकर प्याज सुखाया जाता है। इसके बाद मंडी में ले जाने की बारी आती है, जहां दाम कब गिर जाएं, कोई भरोसा नहीं। इसी अनिश्चितता के चलते इस बार किसान आलू जैसी 90 से 105 दिन में तैयार होने वाली फसलों की ओर ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं।

जब दाम चढ़ते हैं, बदल जाती है किस्मत

हालांकि किसान यह भी मानते हैं कि जब प्याज के भाव अच्छे मिलते हैं तो वही फसल जीवन बदल देती है। किसान राहुल दांगी, राजेंद्र पाटीदार, श्याम चौधरी, दुर्गेश शेरा और पवन पाटीदार बताते हैं कि गांवों में बने कई पक्के मकान और महंगे वाहन प्याज की ही देन हैं। कभी-कभी जब भाव 80 से 100 रुपये किलो तक पहुंचते हैं, तो किसानों की सालों की मेहनत एक ही सीजन में रंग ले आती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से फायदेमंद है कंद फसल

कृषि विज्ञान केंद्र की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सविता कुमारी बताती हैं कि कंद वर्ग की फसलें जमीन के लिए बेहद उपयोगी होती हैं। इनसे मिट्टी भुरभुरी होती है, जैविक तत्व बढ़ते हैं और अगली फसल का उत्पादन भी बेहतर मिलता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि फसल चक्र अपनाकर हर दो-तीन वर्ष में ऐसी फसल जरूर लगाएं।

गोदाम हैं, लेकिन उपयोग शून्य

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि क्षेत्र में प्याज भंडारण के लिए बनाए गए गोदाम ही निष्क्रिय पड़े हैं। वरिष्ठ किसान नाथू सिंह सेठ, रामचंद्र दांगी और सूरज सिंह पाटीदार बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों में उद्यानिकी विभाग द्वारा 50 से अधिक प्याज गोदामों पर सब्सिडी दी गई, लेकिन आज एक भी गोदाम सक्रिय हालत में नहीं है। भंडारण की सुविधा न होने के कारण किसान मजबूरी में औने-पौने दामों पर फसल बेचने को विवश हो जाते हैं।

प्याज कभी किसानों की उम्मीद थी, आज सबसे बड़ा जोखिम

यदि भंडारण, समर्थन मूल्य और विपणन व्यवस्था मजबूत की जाए, तो यही फसल फिर से किसानों के जीवन में खुशहाली ला सकती है। वरना आने वाले समय में प्याज की खेती सिर्फ बड़े और जोखिम उठाने वाले किसानों तक ही सिमट कर रह जाएगी।

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