शिक्षक दिवस: वर्षा सिंह नेगी की प्रेरक कहानी, 16 साल से संवार रहीं बच्चों का भविष्य
खुद भी जिम्मेदारियां निभाईं, अब हजारों बच्चों के भविष्य में भर रहीं शिक्षा की रोशनी

देवास। शिक्षक होना सिर्फ पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि किसी बच्चे के सपनों को उड़ान देना भी है। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ उन बच्चों के भविष्य को संवारना, जिनके पास शिक्षा के पर्याप्त अवसर नहीं हैं, अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है।
देवास की शिक्षिका एवं जनशिक्षक वर्षा सिंह नेगी पिछले 16 वर्षों से इसी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं। ग्रामीण अंचलों की शालाओं में सेवाएं देते हुए उन्होंने बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और वंचित बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
वर्ष 2009 में शुरू हुआ शिक्षकीय सफर आज हजारों बच्चों तक पहुंच चुका है। टोंकखुर्द विकासखंड के ग्राम भैरवाखेड़ी स्थित शासकीय माध्यमिक विद्यालय से शिक्षकीय सेवा की शुरुआत करने वाली वर्षा सिंह नेगी ने यहां विद्यालय हित के साथ पर्यावरण संरक्षण और विद्यालय की संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी कार्य किया। इसके बाद सोनकच्छ विकासखंड के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र भागसरा में सेवाएं देते हुए उन्होंने बालिका शिक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया।
ग्रामीण परिवेश की बच्चियों को केवल स्कूल तक लाना ही नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी उन्होंने प्रयास किए। बच्चियों को अपने निजी खर्च से सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का प्रशिक्षण दिलवाया, ताकि शिक्षा के साथ वे घर बैठे रोजगार से भी जुड़ सकें। उनके इन प्रयासों की ग्रामीण क्षेत्र में विशेष चर्चा रही।
अब 120 से ज्यादा स्कूलों से जुड़ा दायित्व-
ग्रामीण क्षेत्रों की शालाओं में एक दशक से अधिक समय तक सेवाएं देने के बाद वर्ष 2020 में विभाग ने उनकी कार्यक्षमता और शिक्षा के प्रति समर्पण को देखते हुए उन्हें देवास विकासखंड में जनशिक्षक के पद पर चयनित किया।
वर्तमान में वे शासकीय श्री नारायण विद्या मंदिर क्रमांक-1 के अंतर्गत आने वाले 40 से अधिक शासकीय और 80 से अधिक निजी विद्यालयों से जुड़े शैक्षणिक दायित्वों का निर्वहन कर रही हैं। इस जिम्मेदारी के माध्यम से वे हजारों छात्र-छात्राओं और शिक्षकों से जुड़े शैक्षणिक कार्यों में अपनी भूमिका निभा रही हैं।
पिता ने देखा था आदर्श शिक्षिका बनाने का सपना-
वर्षा सिंह नेगी का शिक्षिका बनने का सफर संघर्षों से भी जुड़ा रहा है। इंदौर स्थित कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट में कार्यरत भारती सिंह और स्व. शेर सिंह बिष्ट के परिवार में जन्मी वर्षा के माता-पिता मूल रूप से उत्तराखंड के ग्रामीण पहाड़ी क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।
उनके पिता शिक्षा को जीवन बदलने का माध्यम मानते थे और बेटी को पढ़ाकर एक आदर्श शिक्षिका बनाने का सपना देखते थे। पिता के आकस्मिक निधन के बाद भी वर्षा ने अपनी मां भारती बिष्ट के सहयोग से संघर्ष जारी रखा और वर्ष 2009 में शिक्षकीय भर्ती परीक्षा में सफलता हासिल कर पिता के सपने को पूरा किया।
उनकी मां भारती बिष्ट भी शिक्षा एवं समाजसेवा से जुड़ी रहीं और पहाड़ी क्षेत्र से आने वाले गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने तथा उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं।
शिक्षिका के साथ समाजसेवा का सफर भी जारी-
शासकीय सेवा में आने से पहले भी वर्षा सिंह नेगी सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही हैं। कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के माध्यम से उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक गतिविधियों में भाग लिया। गुजरात की बाढ़ के दौरान राहत कार्यों में सेवाएं देने के साथ एकलव्य संस्था के लिए भी कार्य किया।
वंचित और बेसहारा बच्चों को शिक्षा से जोड़ना उनके पसंदीदा सामाजिक कार्यों में शामिल रहा है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने शिक्षक साथियों के साथ वर्ष 2010 में ‘महात्मा मध्यप्रदेश’ संस्था का गठन किया। संस्था के माध्यम से शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के हित, सम्मान समारोह, पर्यावरण संरक्षण और गरीब बच्चियों की शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता जैसे कार्य किए जा रहे हैं।
अपनी बेटियों के सपनों को भी दी शिक्षा की उड़ान-
दूसरों के बच्चों का भविष्य संवारने वाली वर्षा सिंह ने अपनी दोनों बेटियों की शिक्षा को भी प्राथमिकता दी। एक बेटी ने एमबीबीएस की पढ़ाई में प्रदेश की मेधावी छात्रा के रूप में पहचान बनाई, वहीं दूसरी बेटी ने कानून की उच्च शिक्षा हासिल कर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अपना करियर बनाया।
उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि एक शिक्षक का दायित्व स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता। शिक्षक स्वयं अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियां निभाते हुए आने वाली पीढ़ी का भविष्य गढ़ता है।
शिक्षक दिवस पर वर्षा सिंह नेगी का 16 वर्षों का सफर उन शिक्षकों के लिए प्रेरणा है, जो अपने कर्तव्य को नौकरी नहीं बल्कि जिम्मेदारी और सेवा के रूप में देखते हैं। ग्रामीण बच्चों की शिक्षा से लेकर बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने और समाजसेवा तक उनका सफर बताता है कि एक समर्पित शिक्षक कई जिंदगियों की दिशा बदल सकता है।




