जीवन सहजता से ही संवर सकता है, बंदूक और संदूक से नहीं- सद्गुरु मंगल नाम साहेब

– सहजता के बिना जीवन में शांति नहीं मिल सकती
देवास। सद्गुरु तक पहुंचने के लिए सहजता का होना बहुत जरूरी है। काया मध्ये श्वास है और स्वांसा मध्ये सार। सार शब्द विचार के साहेब कहो सुधार। अर्थात साहब सद्गुरु ही हैं, जो सहज हैं। सद्गुरु के सिवाय जगत में अन्य कोई साहब नहीं। सद्गुरु श्वास के बीच में बैठा हुआ है। वह निरंतर संदेश दे रहा है, लेकिन हम अज्ञानतावश उसकी आवाज सुन नहीं पाते।
यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सदगुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली मंगल मार्ग टेकरी पर आयोजित गुरुवाणी पाठ, गुरु-शिष्य चर्चा में अपनी अमृतमयी वाणी में व्यक्त किए। उन्होंने कहा, कि संत कबीर का सार सूत्र सहज समाधि है, लेकिन कठिनाई यह है कि संत अपने भाव संसार के सामने प्रकट नहीं कर पाता। यदि वह अपनी बात प्रस्तुत करता है, तो उसे गलत अर्थों में ले लिया जाता है। यह भाषा की कठिनाई है की आंतरिक अनुभूति को कहना मुश्किल है। संत कबीर ने बहुत ही सरल माध्यम से अंतरात्मा से निकली वाणी विचारों को जन-जन तक पहुंचाया।
कहते हैं चल हंसा उस देश जहां दिन रहत न ही रेन। वे उस स्थान की बात कर रहे हैं जहां दिन और रात नहीं होती। सारे भेदभाव मिट जाते हैं। उन्होंने आम बात के माध्यम से खास संदेश दिया है, कि जीवन को बदलने के लिए सत्संग करें। व्यक्ति संतों की संगति करेगा तो संत जैसा हो जाएगा। अहंकार मिटे बिना सहजता आना मुश्किल है।
सहजता के बिना जीवन में शांति नहीं मिल सकती। साधना के संबंध में सद्गुरु मंगलम साहेब कहते हैं कि स्वर गुरु हैं, जो भी है वह सांस से मालूम पड़ता है। मेरे लिए आत्मा ही कबीर है। संत कबीर मनुष्य को जगाते हैं कि जीवन न तो बंदूक से ना संदूक से संवर सकता है। उसके लिए तो सहज होना पड़ेगा।
इस दौरान साध संगत ने सद्गुरु मंगलनाम साहेब को नारियल भेंट कर आशीर्वचन लिए। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।




