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इंदौर से खण्डवा: कहां 25 रुपये का ट्रेन सफर और अब बस में 260 का बोझ और असहनीय कष्ट

घटा सुकून; 3-4 घंटे के बस सफर में कष्ट और बेइज्जती भरा फासला, राखी पर घर जाने से भी कतरा रहे लोग

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इंदौर (अखिलेश श्रीराम बिल्लौरे)। कभी इंदौर से खंडवा जाने के लिए जेब में 50-100 रुपये होना काफी था। ट्रेन की खिड़की से आती हवा, बैठने की जगह और रास्ते में यात्रियों से होने वाली बातचीत के बीच सफर कब पूरा हो जाता था, पता ही नहीं चलता था। आज वही रास्ता कई लोगों के लिए आर्थिक बोझ और मानसिक परेशानी का कारण बन गया है।

25 रुपये की ट्रेन से 260 रुपये की बस तक: इंदौर-खंडवा का सफर गरीब के लिए दर्द

वो दिन याद हैं जब इंदौर से खण्डवा या खण्डवा से इंदौर जाने के लिए जेब में सिर्फ 100 रुपये रखना काफी होता था था। ट्रेन में आना जाना 50 रुपये में हो जाता था, शेष रुपये से खरीदारी हो जाती थी। अब 1000 रुपये भी कम हैं। एक दशक पहले ट्रेन की सीट, खिड़की की हवा और यात्रियों के बीच आपस में बातचीत से रास्ता कट जाता था।

उसी समय बस का किराया 130 रुपये था तो गरीब उसी 25 रुपये वाली ट्रेन को चुनता था। लेकिन जब से ट्रेन सुविधा बंद हुई है, हालात बदल गए। अब बस ही एकमात्र सहारा है और उसका किराया भी 130 से सीधे 260 रुपये पहुंच गया है। डबल से ज्यादा।

नतीजा – गरीब की कमर टूट गई है। और सिर्फ किराया ही नहीं, बस का सफर अब सजा बन गया है। कंडम बसें, टूटी सीटें, कर्कश आवाज। गर्मी में पसीने से तरबतर यात्री और सर्दी में कड़कड़ाती हवा, बारिश में छत से गिरता पानी। 3-4 घंटे का सफर, पैर रखने की जगह तक नहीं मिलती। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को धक्के खाकर खड़े-खड़े जाना पड़ता है।

सबसे ज्यादा चुभता है व्यवहार। “पैसा दो और चुपचाप बैठो” वाला लहजा। सामान रखने पर अतिरिक्त पैसे, बोलने पर डांट, और धमकी। अब जबकि सावन चल रहा है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग और महाकाल के दर्शन और राखी का त्योहार सामने है। खण्डवा, बुरहानपुर, नेपानगर से इंदौर में मजदूरी या जीवन यापन के अन्य कार्य अन्य करने आए लोग इस बार घर जाने से कतरा रहे हैं।

“पहले 50 रुपये में आना-जाना हो जाता था। अब एक बार जाने में ही 260 रुपये। ऊपर से 4 घंटे खड़े-खड़े जाना। राखी के लिए 500 का बजट सिर्फ सफर में चला जाएगा, वह भी कम है” – एक बहन ने फोन पर कहा। उसकी आवाज कांप गई।

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इलाज के लिए एमवाय अस्पताल आने वाले मरीज अब सोचते हैं कि जाना जरूरी है या नहीं। सब्जी-मंडी वाले बताते हैं कि पहले ट्रेन में 2 बोरी सस्ते में चली जाती थी। अब बस वाले या तो मना कर देते हैं या मनमाना भाड़ा मांगते हैं।

130 रुपये से 260 रुपये तक का सफर सिर्फ महंगा नहीं हुआ, ये अपमानजनक भी हो गया है। राखी पर बहन भाई से नहीं मिल पा रही, सावन में श्रद्धालु दर्शन को तरस रहे हैं।

रेलवे का कहना है काम चल रहा है, जल्द ट्रेन शुरू होगी। लेकिन तब तक इंदौर-खण्डवा के बीच का ये 260 रुपये वाला, कष्ट और बेइज्जती भरा फासला विशेषकर गरीब के लिए पहाड़ बना हुआ है। 25 रुपये वाली इज्जत और सुकून की ट्रेन फिर पटरी पर कब आएगी, यही सवाल हर यात्री की जुबान पर है।

✍️ लेखक परिचय:
अखिलेश श्रीराम बिल्लौरे वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए आमजन से जुड़े मुद्दों, सामाजिक सरोकारों और जनसमस्याओं को अपनी लेखनी के माध्यम से प्रमुखता से उठा रहे हैं। उनके लेखों में जमीनी हकीकत और आम आदमी की आवाज को प्रमुख स्थान मिलता है।

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