होली: परंपरा, संस्कृति और श्रद्धा का प्रतीक, डांडा रोपने की निभाई परंपरा

टोंकखुर्द (विजेंद्रसिंह ठाकुर)। भारत का हर पर्व अपनी अनूठी परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों से समृद्ध होता है, और होली भी इसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण पर्व है। रंगों, उमंग और हंसी-खुशी से भरे इस त्योहार की शुरुआत माघ पूर्णिमा से होती है, जब शुभ मुहूर्त में होलिका डांडा रोपने की परंपरा निभाई जाती है। मध्य प्रदेश के देवास जिले के बरदू गाँव में भी यह परंपरा श्रद्धा और उल्लास के साथ पूरी की गई।
होलिका डांडा रोपण की परंपरा-
होलिका दहन से पहले डांडा रोपने की प्रथा भारतीय लोकसंस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। इस अवसर पर मंदिरों में भगवान ठाकुरजी के समक्ष फाग के गीत गाए जाते हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय हो उठता है। बरदू गाँव में इस वर्ष भी पटेल सेंधव समाज ने इस परंपरा का निर्वहन किया। बुधवार को पटेल विक्रम सिंह के पुत्र विजेंद्र सिंह और भंवर सिंह जब अपने घर पहुँचे, तो कलाकारों की टोली ने डंडा नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण इकट्ठा हुए और इसकी सराहना की।
डांडा रोपण के बाद की प्रक्रिया–
डांडे के चारों ओर लकड़ियाँ और कंडे (उपले) जमाकर सुंदर रंगोली बनाई जाती है। होली की विशेष पूजा संपन्न होती है, जिसमें विशिष्ट कंडों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें भरभोलिए कहा जाता है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने उपले होते हैं, जिनके बीच में छेद होता है। इन उपलों को मूंज की रस्सी से पिरोकर माला बनाई जाती है, जिसमें सात भरभोलिए होते हैं।
होलिका दहन से पहले यह माला भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाई जाती है और फिर होलिका में डाल दी जाती है, जिससे यह विश्वास जुड़ा है कि होली की अग्नि भाई-बहनों की बुरी नजर और सभी नकारात्मकता को नष्ट कर देती है।
होलिका दहन की रस्म-
फाल्गुन पूर्णिमा की रात को विधिवत पूजा-अर्चना के बाद होलिका दहन किया जाता है। होलिका में से प्रह्लाद रूपी डांडा निकालकर सुरक्षित रखा जाता है, जबकि दूसरी लकड़ियाँ और उपले अग्नि को समर्पित कर दिए जाते हैं। इस दौरान फाग और लोकगीतों का आयोजन किया जाता है, जिससे समूचा वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो जाता है।
संस्कृति और मान्यताओं का संगम-
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिकता का संगम है। यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है, जिसमें भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के अहंकार के विनाश की कथा समाहित है। देवास के बरदू गाँव में मनाई जाने वाली यह परंपरा भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूती देने का कार्य कर रही है।




