बछ बारस पर गौ माता की पूजा-अर्चना, संतान की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत

सुबह से ही घरों और मंदिरों में दिखी आस्था, गाय-बछड़े की पूजा कर महिलाओं ने की सुख-स्वास्थ्य की कामना
बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। बछ बारस के अवसर पर मंगलवार को क्षेत्र में आस्था का अनूठा दृश्य देखने को मिला। संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना लेकर महिलाओं ने उपवास रखा और गाय-बछड़े की पूजा की।
सुबह से ही महिलाएं पूजन की तैयारी में जुटी रहीं। नरसिंह मंदिर सहित गांव के विभिन्न स्थानों पर गाय-बछड़े का पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के मंगल की कामना की गई।
नरसिंह मंदिर के पुजारी गोवर्धन उपाध्याय ने बताया कि बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी का व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और मंगल कामना के लिए रखती हैं। गांव में अधिकांश किसान परिवारों के यहां गौ माता होने से महिलाओं ने घर पर ही पूजा की। जिन परिवारों के यहां गाय नहीं थी, उनकी महिलाएं पड़ोस के घर पहुंचीं और गाय-बछड़े की पूजा कर व्रत की परंपरा निभाई।
व्रत के दौरान महिलाओं ने दिनभर धार्मिक नियमों का पालन किया। इस दिन गेहूं का उपयोग नहीं किया गया, वहीं गाय के दूध, दही और घी का सेवन भी नहीं किया। मान्यता के अनुसार इन्हें बछड़े का हिस्सा माना जाता है। भोजन में अंकुरित मूंग, मोठ, चना और बाजरे का उपयोग किया गया। वहीं चाकू-कैंची जैसी धारदार वस्तुओं से काटी गई फल-सब्जियों का उपयोग भी नहीं किया गया।
बछ बारस को लेकर महिलाओं में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी मान्यता भी विशेष आस्था का विषय रही। मान्यता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण पहली बार बछड़ों को लेकर गाय चराने के लिए घर से बाहर गए थे। इसी भाव के साथ महिलाओं ने गौ माता और बछड़े की पूजा कर संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना की।
क्षेत्र के खेड़ापति हनुमान मंदिर में भी महिलाओं ने पुजारी हरीश उपाध्याय के सानिध्य में गाय-बछड़े का पूजन किया। इस दौरान महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा कर संतान की दीर्घायु की कामना की।
पंडित हरीश उपाध्याय ने कहा कि सनातन परंपरा में प्रकृति और जीव-जगत के प्रति सम्मान का भाव रहा है। गाय को माता के रूप में पूजने की परंपरा भी इसी आस्था से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों से चली आ रही ऐसी परंपराएं प्रकृति और संस्कृति को साथ लेकर चलने का संदेश देती हैं।



