धर्म-अध्यात्म

गोबर की संजा से प्रिंटेड संजा तक पहुंचा पर्व, बदल रही गांवों की परंपरा

16 दिन तक चलने वाले संजा पर्व में कभी गूंजते थे लोकगीत, अब कई घरों में दीवार पर चिपक रही प्रिंटेड संजा

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बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। श्राद्ध पक्ष के साथ ही अंचल में लोक परंपरा से जुड़ा संजा पर्व शुरू हो गया है। 16 दिवसीय इस पर्व का आज दूसरा दिन है। शाम ढलते ही कुंवारी कन्याएं संजा की तैयारी में जुट जाती हैं। हालांकि समय के साथ संजा पर्व का स्वरूप भी बदलता दिखाई दे रहा है।

कभी घरों की दीवारों पर गोबर से रोज नई संजा बनाई जाती थी, लेकिन अब इसकी जगह प्रिंटेड संजा ने ले ली है। इसके साथ ही संजा के अवसर पर गली-मोहल्लों में सुनाई देने वाले पारंपरिक लोकगीत भी पहले की तुलना में कम सुनाई दे रहे हैं।

शाम होते ही शुरू हो जाती थी संजा की तैयारी-
एक समय था जब श्राद्ध पक्ष की शाम होते ही बालिकाएं और युवतियां संजा की तैयारी में जुट जाती थीं। घर की दीवार पर गोबर से वर्गाकार आकृति बनाई जाती और उसे फूल, पंखुड़ियों, चमकीली सामग्री सहित अन्य चीजों से सजाया जाता था। इसके बाद मोहल्ले की सहेलियों को बुलाकर संजा के सामने आरती की जाती और लोकगीत गाए जाते थे।

“संजा बाई तू थारे घर जा…” जैसे गीत अब कम सुनाई देते हैं-
संजा पर्व पर गाया जाने वाला लोकगीत “संजा बाई तू थारे घर जा, थारी बाई मारेगी-कुटेगी…” कभी गांवों और मोहल्लों की शाम का हिस्सा हुआ करता था। संजा की आरती के बाद बालिकाएं प्रसाद बांटतीं और फिर दूसरी सहेली के घर जाकर वहां भी संजा के सामने गीत और आरती का क्रम दोहराया जाता था। अब आधुनिकता के दौर में यह परंपरा कई जगह सीमित होती जा रही है।

हर दिन अलग-अलग आकृति-
वरिष्ठों के अनुसार संजा पर्व केवल धार्मिक परंपरा नहीं है। संजा बनाने और उसे अलग-अलग रूप में सजाने से बच्चों में रचनात्मकता, चित्रकला और निर्माण की कला विकसित होती है। बालिकाएं जब प्रतिदिन अलग-अलग आकृतियां बनाती हैं तो उनकी कल्पनाशक्ति, समझ और कलात्मक प्रतिभा भी विकसित होती है। बदलते समय में संजा का स्वरूप भले ही बदला है, लेकिन बच्चों के व्यक्तित्व और रचनात्मक विकास की दृष्टि से इस परंपरा का महत्व आज भी बना हुआ है।

16 दिनों में अलग-अलग रूप लेती है संजा-
संजा पर्व के दौरान हर दिन अलग आकृति बनाई जाती है। पहले दिन पांच-पांचे, दूसरे दिन बीजोरा, तीसरे दिन तिजोरा, चौथे दिन बजोट, पांचवें दिन कुंवारा-कुंवारी, छठे दिन छबड़ी, सातवें दिन सातिया (स्वस्तिक), आठवें दिन आठ पंखुड़ी का फूल, नौवें दिन डोकरा-डोकरी और दसवें दिन बंदर की थैली बनाई जाती है। ग्यारहवें दिन केल यानी केले का पेड़ बनाया जाता है। बारहवें दिन से पूरा किलाकोट बनना शुरू होता है।

गोबर की जगह अब प्रिंटेड संजा-
समय के बदलाव के साथ संजा बनाने की परंपरा में भी बदलाव आया है। पहले बालिकाएं प्रतिदिन दीवार पर गोबर से नई आकृति बनाती थीं, लेकिन अब कई घरों में बाजार में उपलब्ध प्रिंटेड संजा दीवार पर चिपका दी जाती है। इससे रोज नई संजा बनाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। हालांकि ग्रामीण अंचल में आज भी कई घर ऐसे हैं, जहां बालिकाएं गोबर से संजा बनाकर उसकी आरती कर रही हैं।

11 अक्टूबर तक चलेगा पर्व-
श्राद्ध पक्ष के दौरान मनाया जाने वाला संजा पर्व कुल 16 दिनों तक चलता है और इस वर्ष यह पर्व 11 अक्टूबर तक चलेगा। बदलते समय के बीच अंचल में संजा की परंपरा अब भी कायम है, लेकिन इसके पारंपरिक स्वरूप और उससे जुड़े लोकगीतों का दायरा पहले की तुलना में सिमटता नजर आ रहा है।

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