पितरों की सेवा के बिना दानवीर कर्ण को भी नहीं मिली थी मुक्ति- जोशी

श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा पर बाबा भंवरनाथ मंदिर परिसर में हुआ सामूहिक पिंडदान, विभिन्न समाजों के लोगों ने पूर्वजों को किया याद
भौंरासा (मनोज शुक्ला)। श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा के अवसर पर नगर के बाबा भंवरनाथ मंदिर परिसर में विभिन्न समाजों के लोगों ने सामूहिक रूप से पिंडदान कर अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद किया।
मान्यता के अनुसार पितरों की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए लोग अपनी आस्था के अनुसार पिंडदान, तर्पण और अन्य पारंपरिक अनुष्ठान करते हैं।
श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों के निमित्त धूप- ध्यान, पूजन-पाठ, तर्पण और दान करने की परंपरा रही है। इसी क्रम में बाबा भंवरनाथ मंदिर परिसर में आयोजित सामूहिक पिंडदान में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन किया। इसके बाद रानी दमयंती तालाब में पारंपरिक अनुष्ठान के साथ पितरों का तर्पण किया गया।
कर्ण की कथा से समझाया श्राद्ध का महत्व-
पं. मनोज जोशी ने श्राद्ध की महत्ता बताते हुए दानवीर कर्ण से जुड़ी मान्यता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मान्यता के अनुसार कर्ण ने जीवनभर खूब दान किया, लेकिन पितरों की सेवा और उनके निमित्त दान नहीं किया था। मृत्यु के बाद जब उन्हें इसका कारण बताया गया तो उन्हें धरती पर वापस आकर 16 दिनों तक अपने पूर्वजों की सेवा और दान करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई। यह कथा पितरों के प्रति सेवा, श्रद्धा और दान की परंपरा के महत्व को बताती है।
पुरानी मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष के दौरान शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है। लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार ब्राह्मण भोज कराते हैं तथा दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेते हैं।
बाबा भंवरनाथ मंदिर में विशेष संगम-
नगर परिषद अध्यक्ष संजय जोशी ने बताया कि बाबा भंवरनाथ मंदिर परिसर में श्राद्ध पक्ष की पूर्णिमा पर प्रतिवर्ष पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है। इस स्थान की विशेषता यहां मौजूद बाबा भंवरनाथ महाराज की जीवित समाधि, प्राचीन पीपल और बरगद के वृक्ष, रानी दमयंती तालाब तथा पास स्थित अति प्राचीन कुंड का संगम है। इसी कारण यहां श्राद्ध पक्ष में तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं।
संजय जोशी ने कहा कि जीवन में परिस्थितियां चाहे सुख की हों या दुख की, व्यक्ति को अपना कर्म नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि परंपराओं और अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहना ही हमारी संस्कृति की पहचान है।
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