सत्संग और कथा जीवन के भ्रम मिटाकर भक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं- पं. बृजकिशोर नागर

उज्जैन। श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, भक्ति और आत्मचिंतन की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक साधना है।
कथा श्रवण से मनुष्य के भीतर संस्कार, सद्भाव, विनम्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना जागृत होती है। संतों के वचन जीवन के भ्रम, मोह और अहंकार को दूर कर प्रभु से जुड़ने की प्रेरणा देते हैं।
यह विचार मां उमिया धर्मशाला, माकड़ोन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कथावाचक पं. बृजकिशोर नागर ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि संसार का वैभव, धन और सुविधाएं क्षणिक हैं। भगवान का नाम ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। प्रभु भक्ति से प्राप्त आध्यात्मिक संपदा कभी नष्ट नहीं होती। उन्होंने मीरा बाई का उदाहरण देते हुए कहा कि मीरा ने संसार का नहीं, बल्कि “राम रतन धन” कमाया था, जो अमूल्य और शाश्वत है।

दान के साथ विषमताएं भी होती हैं विदा- पं. नागर ने कहा कि कई लोग 100 या 500 रुपये के नोट के साथ एक रुपये का सिक्का रखकर दान करते हैं। इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि 100 का नोट सम संख्या में हैं और एक विषम संख्या में। जब 100 या 500 में 1 मिल जाता है तो वह विषम हो जाता है। ऐसे में दान के साथ जीवन की विषमताएं, कष्ट और नकारात्मकताएं भी समर्पित हो जाती है।
राम के बिना हर वैभव अधूरा– उन्होंने कहा कि लंका में सोने का वैभव, संपत्ति और सभी सुख-सुविधाएं थीं, लेकिन वहां भगवान राम नहीं थे। इसलिए इतना वैभव भी अधूरा था। जिसके जीवन में भगवान नहीं, वहां सुख भी अधूरा रह जाता है। राम के बिना कोई भी वैभव पूर्ण नहीं हो सकता।

भगवान का नाम सबसे बड़ा धन- उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन कमाने में लगा रहता है, लेकिन अंत में सब यहीं छूट जाता है। केवल प्रभु नाम का धन ही ऐसा है जो आत्मा के साथ रहता है।
जिसने सब दिया, उसी को भूल गया मनुष्य-पं. नागर ने कहा कि जिसने हमें जीवन, सांस, परिवार और सब कुछ दिया, उसी परमात्मा को मनुष्य सबसे पहले भूल जाता है। यही आध्यात्मिक पतन का सबसे बड़ा कारण है।
संसार का मोह भी शिकारी के जाल जैसा- मनुष्य मोह, भ्रम और छलावे में उलझा हुआ है। जिस प्रकार शिकारी दाना डालकर पक्षी को जाल में फंसा लेता है, उसी प्रकार संसार के आकर्षण, लोभ, मोह हमें अपने जाल में बांध लेते हैं। इसलिए सत्य को समझना और ईश्वर से जुड़ना आवश्यक है।
मीठा बोलना भी एक साधना- उन्होंने कहा कि लोग मीठा भोजन तो खूब करते हैं, लेकिन मीठी वाणी बोलने से कतराते हैं। मधुर व्यवहार और प्रेमपूर्ण शब्द भी भगवान की सच्ची पूजा हैं।
भगवान पर अटूट भरोसा रखें- उन्होंने भक्त नरसिंह मेहता का उदाहरण देते हुए कहा कि जो व्यक्ति भगवान पर पूर्ण विश्वास रखता है, उसके कार्यों को स्वयं भगवान करते हैं। सच्चे भक्त का कभी अहित नहीं होता।
कृष्ण के बिना सूना हो गया गोकुल- उन्होंने कहा कि जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल छोड़ा, उसी दिन से गोकुल की गलियां सूनी हो गईं। भगवान की उपस्थिति ही किसी स्थान और जीवन की वास्तविक शोभा होती है।
रुक्मिणी विवाह प्रसंग में भावविभोर हुए श्रद्धालु- कथा के दौरान पं. बृजकिशोर नागर ने भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह का अत्यंत भावपूर्ण एवं भक्तिमय वर्णन किया। विवाह प्रसंग के साथ भक्ति, प्रेम और समर्पण का महत्व समझाया। कथा सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरा पांडाल भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा।
अंत में आरती कर विश्व कल्याण, सुख-समृद्धि और मानव मात्र के मंगल की प्रार्थना की गई। आरती में यजमान मुरलीधर शर्मा, शारदा देवी शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।




