धर्म-अध्यात्म

भक्ति, सेवा और समर्पण का संगम: मंदिर में भगवान श्रीराम परिवार सहित हुए विराजमान

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उदयनगर (बाबू हनवाल)। आस्था, दानशीलता और सामूहिक सहयोग का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला, जहां खेड़ापति हनुमान मंदिर परिसर में भगवान श्रीराम परिवार सहित भव्य रूप से विराजमान हुए। स्थानीय लोगों के सहयोग, दानदाताओं की उदारता और श्रद्धालुओं की मेहनत से तैयार यह मंदिर अब क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है।

उदयनगर स्थित खेड़ापति हनुमान मंदिर परिसर में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की सुंदर मूर्तियों की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा की गई। गीतादेवी सोनी द्वारा पांच लाख रुपये का दान देकर मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया। उनके इस सहयोग ने पूरे क्षेत्र में धार्मिक भावना को नई ऊर्जा दी।

मंदिर निर्माण केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जनभागीदारी का भी शानदार उदाहरण बना। मंदिर परिसर में बनी विशाल धर्मशाला की हर एक ईंट स्थानीय कुम्हार परिवारों द्वारा नि:शुल्क भेंट की गई, जो सेवा और समर्पण की मिसाल है।
इसके साथ ही रिटायर्ड स्वर्गीय हरनामसिंह आर्य द्वारा भव्य रामदेव बाबा मंदिर का निर्माण भी कराया गया, जो परिसर की धार्मिक गरिमा को और बढ़ाता है।

श्रीराम मित्र मंडल द्वारा नियमित रूप से रामायण पाठ और सुंदरकांड का आयोजन किया जाता है। मंडल के सदस्य दीपक विश्वकर्मा ने बताया कि वे जहां भी सुंदरकांड का आयोजन करते हैं, वहां प्राप्त होने वाली राशि को मंदिर निर्माण और धार्मिक कार्यों में ही लगाया जाता है। विशेष बात यह है कि मंडल के सदस्य इन आयोजनों में अपने निजी खर्च से शामिल होते हैं, जो उनकी निस्वार्थ सेवा भावना को दर्शाता है।

मंदिर में स्थापित मूर्तियां विशेष प्रकार के संगमरमर से निर्मित हैं, जो अपनी आकर्षक बनावट और दिव्यता से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। मंदिर परिसर के पास एक सुंदर और विशाल बगीचा भी विकसित किया गया है, जो श्रद्धालुओं के लिए शांति और सुकून का केंद्र बन गया है। पूरे विधि-विधान के साथ पंडित संजय शर्मा द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न कराई गई। इस अवसर पर भगवान श्रीराम की मूर्ति का नगर में भव्य चल समारोह भी निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

कार्यक्रम में जिला योजना सलाहकार समिति के सदस्य एवं अधिवक्ता प्रवीण चौधरी ने कहा कि उदयनगर वास्तव में बहुरत्न वसुंधरा है, जहां दानशीलता, धर्मशीलता और कर्मशीलता की त्रिवेणी देखने को मिलती है। यज्ञ के दौरान दस यजमानों द्वारा श्रीराम भगवान के प्रतीक चिन्ह भेंट किए गए और सभी दानदाताओं का सम्मान भी किया गया।

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