मृत्यु देह की होती है, जीव की नहीं इसे समझते ही व्यक्ति सम्राट हो जाता है- सद्गुरु मंगल नाम साहेब

देवास। जीवन क्या है, मृत्यु क्या है यह बहुत सूक्ष्म विषय है। अब तक इस विषय पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, लेकिन परमात्मा कहीं बाहर नहीं है। हमारे घट में ही है। हम पहचान नहीं पा रहे हैं और दूर-दूर की यात्राएं कर रहे हैं। उसे ढूंढते फिर रहे हैं। वैसे ही मृत्यु सिर्फ देह की होती है, जीव की नहीं।
जीव विदेही है और आदि-अनादि काल से अजर-अमर है। यह विचार सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने सद्गुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली सेवा समिति मंगल मार्ग टेकरी द्वारा आयोजित नित्य गुरुवाणी पाठ गुरु-शिष्य संवाद के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि सदगुरु कबीर साहब ने कहा है कि किसी भी वस्तु का नाश होता ही नहीं है। करता में ही करतूत समाई हुई है, इसलिए मरने जैसी कोई बात नहीं है। जैसे जीवन को स्वीकारा वैसे मृत्यु को भी स्वीकार करें। जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है। मृत्यु देह की होती है जीव की नहीं। यह संदेश सत्पुरुष कबीर का है। इसको समझते ही आदमी सम्राट हो जाता है। आगे कहा कि छल-कपट कर बाहर से बटोरी संपत्ति खत्म हो जाती है, इसलिए बाहर से संपत्ति बटोरने की जरूरत भी नहीं है। श्वास ही हमारा धन है। जिसके जाते ही लोग कह देते हैं कि इसका तो निधन हो गया। निधन हो जाने पर मनुष्य धन को वापरने लायक नहीं बचता। सब धन से रहित हो जाता है, उसका ही नाम निधन है।
उन्होंने कहा, कि इस संसार में आने से पहले मां के पेट में हमारा शरीर अंकुरित होता है। जब इस सांसारिक जगत में मानव आता है तो उलट कर सिर के बल बंदगी कर दोनों हाथ से मुंह छुपा कर बाहर आता है। जो अविगत है वह श्वास है। इसके ऊपर ही सब शरीरों की रचना की गई है। उसको कोई समझ ही नहीं पाया। यह अति सूक्ष्म विषय है क्योंकि जीव, पवन दोनों विदेही है, जिसका कभी नाश नहीं होता। आगे कहा कि बाहर का अंधेरा, उजाला यह घड़ी दो घड़ी का है। जो हमें सूर्य और चंद्रमा से प्राप्त होता है। लेकिन यह बाहर के उजाले से अलग बात है। वह उजियारा ऐसा है, जिसमें सब दिखाई दे वह जीव है, श्वास है। वहां कभी अंधियारा नहीं होता। इस दौरान साध-संगत द्वारा सद्गुरु मंगल नाम साहेब, नीरज साहेब को नारियल भेंट कर आरती की गई। यह जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।




