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Mp news जंगल में महुआ की बहार, सुबह-सुबह फूल बीनने जुट रहे ग्रामीण

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महुआ की भीनी खुशबू से महक रहा वन क्षेत्र, ग्रामीणों की बढ़ी सक्रियता

महुआ की बहार न केवल जंगलों की सुंदरता बढ़ा रही है, बल्कि यह परंपरा, प्रकृति और ग्रामीण जीवन का एक जीवंत प्रतीक बनकर उभर रही है

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। क्षेत्र के जंगलों और ग्रामीण इलाकों में इन दिनों महुआ के पेड़ों पर बहार छाई हुई है। सुबह होते ही पेड़ों के नीचे बड़ी मात्रा में गिरे महुआ फूलों की खुशबू वातावरण को महका रही है, जिसे एकत्रित करने के लिए स्थानीय निवासी तड़के ही जंगलों की ओर रुख कर रहे हैं।

सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होता संग्रह
महुआ के पेड़ों से पके हुए फूल प्रातः 4 से 6 बजे के बीच बड़ी संख्या में जमीन पर गिरते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण और आदिवासी परिवार सुबह-सुबह ही जंगल पहुंचकर इन फूलों को एकत्रित कर रहे हैं। यह कार्य उनके दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है।

आजीविका का भी बन रहा सहारा
महुआ के फूल केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि आय का भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। कई परिवार जंगलों में रहकर लगातार इनका संग्रह करते हैं और सूखाकर अपने उपयोग के साथ-साथ बाजार में बेचते हैं। वर्तमान में सूखा महुआ 60 से 100 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक सहयोग मिल रहा है।

वन नियमों के बीच संतुलन
वन संपदा के अंतर्गत महुआ का संग्रह निर्धारित नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है। स्थानीय निवासियों को सीमित मात्रा में इसे रखने और उपयोग करने का अधिकार है, जबकि अधिक मात्रा में संग्रह और बिक्री वन अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में ग्रामीण परंपरा और नियमों के बीच संतुलन बनाकर कार्य कर रहे हैं।

प्रकृति और पर्यावरण का अनमोल उपहार
महुआ का पेड़ पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी घनी छांव, पत्तियां और फूल न केवल मनुष्य बल्कि वन्य जीवों के लिए भी उपयोगी हैं। इसके फूलों की प्राकृतिक मिठास और भीनी सुगंध इसे विशेष बनाती है, जो पूरे क्षेत्र में अलग ही पहचान देती है।

शाम को महक उठता है पूरा इलाका
दिनभर की गर्मी के बाद जैसे ही शाम होती है, महुआ के पेड़ों के आसपास का वातावरण इसकी सुगंध से भर उठता है। राहगीर भी इस खुशबू को महसूस किए बिना नहीं रह पाते, जिससे जंगल और ग्रामीण इलाकों का वातावरण और भी आकर्षक हो जाता है।

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