जो अपने अवगुण पहचान लेता है, उसे कोई दुखी नहीं कर सकता: सद्गुरु मंगल नाम साहेब

देवास। सद्गुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थलीय सेवा समिति, मंगल मार्ग टेकरी द्वारा आयोजित गुरु-शिष्य संवाद एवं गुरुवाणी पाठ कार्यक्रम में सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने कहा कि जो व्यक्ति अपने अवगुणों को पहचान लेता है, उसे संसार में कोई दुखी नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि संतजन दूसरों के दोष नहीं, बल्कि गुणों की तलाश करते हैं और जहां से भी सद्विचार, सद्बुद्धि एवं पवित्रता प्राप्त होती है, उसे सहज भाव से ग्रहण कर लेते हैं।
सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने कहा कि संतों की सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि व्यक्ति दूसरों के अवगुण खोजने के बजाय स्वयं का आत्मनिरीक्षण करे। इस संदर्भ में उन्होंने संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा सुनाते हुए कहा— “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।” उन्होंने बताया कि कबीर साहेब ने स्वयं के दोषों को पहचानने और आत्मचिंतन का मार्ग अपनाने का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने भीतर झांककर अपने अवगुणों को समझ लेता है, वही वास्तविक सुख और शांति का अनुभव कर सकता है। इसके विपरीत जो लोग दूसरों की कमियां और दोष खोजने में लगे रहते हैं, वे स्वयं ही परेशानियों में घिरे रहते हैं। संसार में अनगिनत लोगों के दोष खोजने का प्रयास करने के बजाय व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
सद्गुरु ने कहा कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी के अत्यंत निकट है, लेकिन अज्ञानवश मनुष्य उसे पहचान नहीं पाता। कबीर साहेब की वाणी “मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि परमात्मा को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी वेशभूषा, दाढ़ी-जटा बढ़ाने या वस्त्रों को रंग लेने से कोई संत, ज्ञानी या साधक नहीं बन जाता। जब तक मन साधना, भक्ति और सत्संग के रंग में नहीं रंगता, तब तक जप, तप और पूजा का वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होता। संत कबीर का संदेश भी यही है कि मन की शुद्धता और आत्मिक जागृति ही सच्ची साधना का आधार है।
कार्यक्रम के दौरान साध-संगत ने सद्गुरु मंगल नाम साहेब को नारियल भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुवाणी पाठ एवं सत्संग का लाभ लिया। कार्यक्रम की जानकारी समिति के सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।




