कभी 1 हज़ार हेक्टेयर में बोई जाती थी मूंगफली, अब 50 से भी कम; बाजार के तेल पर निर्भर हुए किसान
लागत, मजदूरी और कम उत्पादन ने किसानों को फसल से किया दूर

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। क्षेत्र में कभी किसानों के खेतों की पहचान रही मूंगफली अब तेजी से गायब हो रही है। करीब 1000 हेक्टेयर तक बोई जाने वाली इस फसल का रकबा घटकर पूरे विकासखंड में 50 हेक्टेयर से भी कम रह गया है। लागत, मजदूरी और कम उत्पादन ने किसानों को इससे दूर कर दिया, वहीं घर के शुद्ध तेल की जगह बाजार पर निर्भरता बढ़ गई है।
उल्लेखनीय है कि कभी बेहरी क्षेत्र के किसानों के घरों में सालभर के खाने के तेल का इंतजाम खेतों में ही हो जाता था। मूंगफली की इतनी पैदावार होती थी कि घर के उपयोग के लिए तेल निकलने के साथ पशुओं के लिए खली भी पर्याप्त बच जाती थी। लेकिन समय के साथ खेती का गणित बदला और मूंगफली का रकबा लगातार सिमटता चला गया। जो फसल कभी क्षेत्र में करीब 1000 हेक्टेयर तक बोई जाती थी, उसका रकबा अब पूरे विकासखंड में 50 हेक्टेयर से भी कम रह गया है। नतीजा यह है कि अब गिने-चुने किसान ही मूंगफली की खेती कर रहे हैं और अधिकांश किसान खाद्य तेल के लिए बाजार पर निर्भर हैं।
सोयाबीन, प्याज और आलू ने बदली खेती की तस्वीर
क्षेत्र में पहले मूंगफली के साथ गन्ने की भी बड़े पैमाने पर खेती होती थी। बेहरी में तेल निकालने की घानी चलती थी, वहीं आसपास गुड़ बनाने की कई चरखियां भी संचालित होती थीं। किसानों के लिए ये दोनों फसलें घरेलू जरूरत पूरी करने के साथ आय का जरिया भी थीं।
समय के साथ किसानों ने सोयाबीन, प्याज और आलू जैसी फसलों का रुख किया। इन फसलों से बेहतर बाजार मिलने की उम्मीद ने मूंगफली और गन्ने का रकबा घटा दिया। हालांकि इन फसलों में बाजार भाव और मौसम के कारण जोखिम भी बना रहता है।
घर का तेल और खली की परंपरा भी हुई कमजोर
वरिष्ठ किसानों के अनुसार पहले अधिकांश परिवार अपनी जरूरत के मुताबिक मूंगफली घर में ही रखते थे। इससे तेल निकलवाकर सालभर की जरूरत पूरी हो जाती थी और बची खली का उपयोग पशुओं के लिए किया जाता था।
वरिष्ठ किसान नाथू सिंह दांगी का कहना है कि पहले क्षेत्र में मूंगफली की पर्याप्त पैदावार होती थी, जिससे परिवारों को बाजार से तेल खरीदने की जरूरत कम पड़ती थी। अब मूंगफली की खेती सीमित होने से यह व्यवस्था लगभग खत्म हो गई है।
किसान रामेश्वर सेठ के अनुसार खेती की परिस्थितियां बदलने और दूसरी फसलों की ओर किसानों के जाने से मूंगफली का रकबा लगातार घटा है। उनके मुताबिक यदि स्थानीय स्तर पर इसकी खेती को फिर बढ़ावा मिले तो किसानों को घरेलू जरूरत के लिए बेहतर विकल्प मिल सकता है।
बीज उपलब्धता पर भी उठे सवाल
किसानों ने मूंगफली के रकबे में कमी के पीछे कृषि विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विभागीय स्तर पर मूंगफली के बीज की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं होने से किसानों को अच्छे बीज के लिए परेशानी होती है। इससे भी धीरे-धीरे किसानों की इस फसल में रुचि कम हुई।
हालांकि कृषि विभाग के अनुसार मूंगफली से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है। कृषि विस्तार अधिकारी काशीराम चौहान ने बताया कि मूंगफली की खेती में लागत और मजदूरी अपेक्षाकृत अधिक आती है, जबकि उत्पादन कम होने से किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता। यही वजह है कि किसान धीरे-धीरे सोयाबीन जैसी फसलों की ओर चले गए।
सवाल सिर्फ घटते रकबे का नहीं
मूंगफली का घटता रकबा केवल एक फसल के खत्म होते दौर की कहानी नहीं है। इसके साथ स्थानीय तेल उत्पादन, पशुओं के लिए खली और किसानों की पारंपरिक खेती से जुड़ी एक पूरी व्यवस्था कमजोर हुई है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या बेहतर बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और लाभकारी बाजार उपलब्ध कराकर मूंगफली जैसी पारंपरिक फसलों को फिर किसानों की पसंद बनाया जा सकता है?



