धर्म-अध्यात्म

साधना और सेवा का लक्ष्य परम पुरुष की प्रसन्नता ही है

नाम कीर्तन की महिमा, नाम में निहित है परम शक्ति - आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत

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देवास। आनंद मार्ग प्रचारक संघ देवास के हेमेन्द्र निगम काकू ने बताया कि 13 से 15 मार्च तक आनन्द मार्ग प्रचारक संघ द्वारा बाबा नगर, जमालपुर, बिहार में विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इसमें भारत सहित विदेशी साधक भी उपस्थित हुए।

13 मार्च को प्रकृति की सुरम्य गोद में स्थित आध्यात्मिक केंद्र “आनंद सम्भूति मास्टर यूनिट, अमझर” के कोलकाली मैदान में आयोजित भव्य धर्म महासम्मेलन के प्रथम दिवस का कार्यक्रम आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और उत्साह से परिपूर्ण रहा। हरि परिमंडल गोष्ठी (महिला विभाग) के अंतर्गत आचार्या अवधूतिका आनंद आराधना के नेतृत्व में 22 साधिका बहनों ने भावपूर्ण कौशिकी नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं सेवा धर्म मिशन के अंतर्गत आचार्य सुष्मितानंद अवधूत के निर्देशन में 16 बाल साधकों ने ओज और उत्साह से परिपूर्ण तांडव नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इसके उपरांत प्रभात संगीत संख्या 816 और 817 का भावानुवाद तीन भाषाओं में प्रस्तुत किया गया।

मुख्य प्रवचन में पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने “नाम कीर्तन की महिमा” विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि किसी व्यक्ति या वस्तु को संबोधित करने के लिए नाम आवश्यक होता है, किंतु नाम केवल एक शब्द नहीं है। किसी वस्तु के प्रति जो भाव या मानसिक धारण होता है, वही उसके नाम के साथ जुड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि एक प्राचीन प्रश्न है अधिक शक्तिशाली कौन है, परम पुरुष या उनका नाम? इस संदर्भ में उन्होंने हनुमान और भगवान राम का उदाहरण देते हुए कहा कि हनुमान ने समुद्र लांघने से पहले राम का नाम लेकर ही अपनी शक्ति प्राप्त की। इससे स्पष्ट होता है कि नाम में निहित शक्ति अत्यंत प्रभावशाली होती है।

आचार्य जी ने कहा कि जब तक भक्त नहीं थे, तब तक भगवान का कोई नाम भी नहीं था। भक्तों ने ही भगवान को नाम दिए। इसी कारण भगवान और भक्तों के बीच एक मधुर संबंध और प्रेमपूर्ण संवाद है। भगवान भक्तों को श्रेष्ठ मानते हैं और भक्त भगवान को।

नाम की वैज्ञानिक व्याख्या-
उन्होंने बताया कि नाम में निहित शक्ति केंद्रित और सुप्त अवस्था में रहती है। जब नाम का उच्चारण होता है, तब वह शक्ति सक्रिय होकर प्रभाव उत्पन्न करती है। इसी सिद्धांत को समझाने के लिए उन्होंने (ओं) के प्रतीक का उदाहरण देते हुए कहा कि उसमें स्थित बिंदु संभावित शक्ति का प्रतीक है और अर्धचंद्र उस शक्ति की अभिव्यक्ति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य और परम पुरुष का संबंध प्रेम का संबंध है। साधना, सेवा और पूजा कृ इन सभी का अंतिम उद्देश्य परम पुरुष को संतुष्ट करना है। इसलिए साधक को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि साधना और सेवा का लक्ष्य परम पुरुष की प्रसन्नता ही है।

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