धर्म-अध्यात्म

परमात्मा प्रेम के बंधन में बंधता है, क्रोध के बंधन में नहीं

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bhagvat katha

पं. जितेंद्र महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा में सुनाई गोपियों और कान्हा की अनूठी प्रेम कथा

देवास। मोती बंगला प्रताप गार्डन में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक गुरु पं. जितेंद्र महाराज ने भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के अनोखे प्रेम की कथा सुनाई। श्रद्धालुओं ने भाव विभोर होकर कथा का आनंद लिया और भक्ति गीतों पर झूम उठे।

पंडितजी ने कहा, कि भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की मधुर ध्वनि से गोपियां उनके प्रेम में पागल हो जाती थीं। यह प्रेम ऐसा था, जो कानों और आंखों के माध्यम से उनके हृदय में प्रवेश कर गया। उन्होंने कहा कि प्रेम का यह स्वरूप अलौकिक होता है, जो केवल परमात्मा के प्रति सच्ची भक्ति से प्राप्त होता है।

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उन्होंने एक कथा का वर्णन करते हुए कहा कि एक गोपी काजल लगाते-लगाते कान्हा की बांसुरी की धुन में इतनी मग्न हो गई कि पूरा चेहरा काला कर लिया। दूसरी गोपी रोटियां बनाते समय कच्ची रोटियां पति को परोस देती थी और पकी रोटियां चूल्हे में डाल देती थी। गोपियों का यह प्रेम श्रीकृष्ण के प्रति उनकी आत्मा की गहराई को दर्शाता है।
पंडित जी ने बताया कि एक बार जब गोपियों ने कान्हा को माखन चोरी करते हुए पकड़ने की कोशिश की, तो उन्होंने उन्हें क्रोध में बांधना चाहा, लेकिन कान्हा ने कहा, मैं केवल प्रेम के बंधन में बंधता हूं, क्रोध के बंधन में नहीं।

भक्ति गीतों की प्रस्तुति पर झूम उठे श्रद्धालु-
कथा के दौरान पंडित जितेंद्र महाराज ने श्याम तेरी बंसी पागल कर जाती है और सांवली सूरत पे मोहन दिल दीवाना हो गया जैसे भक्ति गीत प्रस्तुत किए। इन गीतों ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया।

श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन की व्याख्या-
56 भोग की पूजा अर्चना के साथ पंडितजी ने श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि सच्चे प्रेम और भक्ति से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।

आयोजक मंडल ने की पूजा अर्चना-
आयोजन मंडल के सदस्यों विनोदिनी रमेश व्यास, राजेश योगी, हरजीत सिंह अरोरा, महेंद्रसिंह खनूजा, जगजीतसिंह टूटेजा, जयंत विपट, सुरेंद्रसिंह पवारर, मनीष चौधरी, अतुल बागलीकर, अनिल सिकरवार, तंवरसिंह चौहान सहित अन्य ने व्यासपीठ की पूजा-अर्चना की। संचालन भगवानसिंह चावड़ा ने किया। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर धर्म लाभ लिया।

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