बारिश का इंतजार: चाय की दुकान से लेकर चौपाल तक सब विशेषज्ञ

बारिश क्यों नहीं हो रही? जवाब सुनकर आप भी मुस्कुराएंगे
✍️ महेश सोनी
वर्षा ऋतु का नाम सुनते ही हमारे देश में एक अलग ही तरह की हलचल शुरू हो जाती है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान से लेकर चाय की दुकान पर बैठे विशेषज्ञों तक, सभी मानसून के स्वागत में अपने-अपने ज्ञान का पिटारा खोल देते हैं। हर व्यक्ति अचानक मौसम वैज्ञानिक बन जाता है और बादलों की गतिविधियों पर ऐसी टिप्पणी करता है मानो उनका सीधा संपर्क आसमान के कंट्रोल रूम से हो।
भारतीय मौसम विभाग कहता है कि 15 जून के आसपास मध्य प्रदेश में मानसून दस्तक देगा। लेकिन यदि 16 जून हो जाए और बारिश की दो बूंदें भी न गिरें तो लोग घोषणा कर देते हैं—”इस बार पानी बहुत लेट है भैया… पहले तो जून लगते ही बरस जाता था।” यह बात वही लोग कहते हैं जो स्वयं शादी में दो घंटे देर से पहुंचते हैं, बिजली का बिल आखिरी तारीख को जमा करते हैं और बच्चों की फीस भी रिमाइंडर आने के बाद भरते हैं। लेकिन बारिश को समय का पाबंद होना चाहिए!
कुछ लोग प्रदूषण को बारिश न होने का कारण बताते हैं। वे बड़े चिंतित स्वर में कहते हैं, “इतना प्रदूषण हो गया है कि बादल भी आने से डर रहे हैं।”
यह अलग बात है कि सुबह घर का कचरा सड़क पर फेंककर आए हों, बाइक का साइलेंसर निकालकर पूरे मोहल्ले को अपनी मौजूदगी का अहसास करवाते हों और पेड़ लगाने के नाम पर केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हों। लेकिन बारिश नहीं हुई तो दोष सीधे प्रदूषण का।
इन दिनों एक नया वैज्ञानिक सिद्धांत भी खूब सुनने को मिल रहा है। कुछ विद्वान बताते हैं कि जहां-जहां पवन चक्कियां लग गई हैं, उनके बड़े-बड़े पंखे घूमकर बादलों को इधर-उधर भगा देते हैं। बेचारे बादल आते तो हैं पानी लेकर, लेकिन पवन चक्कियां उन्हें रास्ता बदलने पर मजबूर कर देती हैं।
इन महान वैज्ञानिकों के शोध को यदि दुनिया के बड़े-बड़े अनुसंधान संस्थानों तक पहुंचा दिया जाए तो शायद मौसम विज्ञान की सारी किताबें फिर से लिखनी पड़ जाएं। नोबेल पुरस्कार समिति भी शायद उनका पता पूछने लगे।
कुछ लोग आध्यात्मिक विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि “पाप बहुत बढ़ गए हैं, इसलिए बारिश नहीं हो रही।” यह वही लोग होते हैं जो ट्रैफिक सिग्नल तोड़ते हुए, सड़क पर कचरा फेंकते हुए और जरूरतमंद की मदद से मुंह मोड़ते हुए भी दूसरों के पापों का हिसाब रखने में व्यस्त रहते हैं। मानो स्वर्ग से उन्हें विशेष ऑडिट का अधिकार प्राप्त हो गया हो।
कुछ बुजुर्ग कहते हैं, “पहले जैसी बारिश अब कहां होती है?” बात सही भी है। पहले तालाब भी थे, कुएं भी थे, बावड़ियां भी थीं और पानी को रोकने की संस्कृति भी थी। अब हमने तालाबों पर कॉलोनियां बसाईं, नालों को पाट दिया और जमीन को कंक्रीट से ढंक दिया। फिर आश्चर्य करते हैं कि पानी जमीन में क्यों नहीं जा रहा।
सच तो यह है कि बारिश का इंतजार केवल किसान या शहरवासी ही नहीं कर रहे। खेतों में सूखी खड़ी फसलें, प्यासे पशु-पक्षी, मुरझाते पेड़-पौधे और तपती धरती भी आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। एक-एक बूंद का महत्व उन्हें हमसे कहीं अधिक पता है।
आज स्थिति यह है कि पानी की एक लीटर बोतल 20 रुपये में बिक रही है। वह दिन दूर नहीं जब पानी की कीमत सोने-चांदी की तरह चर्चा का विषय बन जाए। इसलिए केवल बारिश का इंतजार करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पानी की हर बूंद को सहेजने की आदत भी विकसित करनी होगी।
बारिश समय पर आए या थोड़ी देर से, यह प्रकृति का विषय है। लेकिन वर्षा जल का संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। हमें वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाना होगा, जल स्रोतों को बचाना होगा और पानी की बर्बादी रोकनी होगी। यदि हम आज जल का सम्मान करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां भी सुरक्षित रहेंगी। याद रखिए, पानी केवल एक संसाधन नहीं, जीवन का आधार है।
“जल है तो कल है, और जल का संरक्षण ही भविष्य का सबसे बड़ा निवेश है।”




