साहित्य

न खाता, न बही… मेडिकल सर्टिफिकेट जो कहे वही सही!

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“आज साहब नहीं आए…”
ऑफिस में किसी ने पूछा तो जवाब मिला, “थोड़ी देर इंतजार कर लेते हैं।”

कुछ देर बाद मोबाइल पर संदेश आया—”मैं मेडिकल अवकाश पर जा रहा हूँ।”

बस, फिर क्या था! सब समझ गए। न कोई सवाल, न कोई जवाब। क्योंकि हमारे दफ्तरों में एक ऐसा जादुई दस्तावेज़ है, जिस पर कभी संदेह नहीं किया जाता—मेडिकल सर्टिफिकेट।

कहावत भी अब बदल जानी चाहिए— “न खाता, न बही… मेडिकल बोले वही सही।” मेडिकल सर्टिफिकेट की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। लगता है जिस दिन नौकरियों का जन्म हुआ, उसी दिन मेडिकल छुट्टी भी अवतरित हो गई।

अच्छे-भले, हंसते-खेलते कुछ लोग अचानक कागज़ों में बीमार हो जाते हैं। हकीकत में वे कभी मकान बनवा रहे होते हैं, कभी किसी शादी में नाच रहे होते हैं, तो कभी घर पर आराम फरमा रहे होते हैं। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वे मरीज होते हैं।

अगर किसी महीने देशभर के सरकारी और निजी कार्यालयों में लगे मेडिकल सर्टिफिकेट गिने जाएँ, तो शायद लगे कि पूरा देश बीमार है। देश की असली स्वास्थ्य रिपोर्ट शायद अस्पतालों से नहीं, बल्कि छुट्टी के आवेदन से निकल सकती है।

ऑफिस में छुट्टियाँ खत्म हो जाएँ तो घबराने की ज़रूरत नहीं। कुछ अनुभवी बाबू मुस्कुराते हुए सलाह देंगे- “मेडिकल सर्टिफिकेट लगा दो… सब सेट हो जाएगा।” यानी मेडिकल छुट्टी, हर छुट्टी का रामबाण इलाज है।

कुछ डॉक्टर साहब भी कम अनुभवी नहीं होते। कई बार पूछते हैं— “कितने दिन का बना दूँ… 10 दिन या 15 दिन?” जैसे बीमारी नहीं, मोबाइल का रिचार्ज प्लान चुन रहे हों। जितने दिन चाहिए, उतने दिन की बीमारी भी तैयार और स्वस्थ होने का प्रमाणपत्र भी तैयार।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेडिकल लेने वाला पहले से जानता है कि वह किस तारीख को बीमार होगा और किस तारीख को पूरी तरह स्वस्थ होकर ऑफिस जॉइन करेगा। इतनी सटीक भविष्यवाणी तो बड़े-बड़े ज्योतिषी भी नहीं कर पाते।

और यदि छुट्टी बढ़ानी हो, तो तरीका भी तय है—15 दिन का मेडिकल, एक दिन ऑफिस में हाज़िरी और फिर नया मेडिकल। मानो बीमारी भी टाइम-टेबल देखकर आती-जाती हो।

धीरे-धीरे यह दृश्य देखकर दूसरे कर्मचारियों का भी मन करने लगता है—”जब सब मेडिकल पर जा रहे हैं, तो मैं ही स्वस्थ रहकर क्या करूँ?” फिर वे भी इस “मेडिकल महिमा” के भक्त बन जाते हैं।

आख़िर में सब खुश हैं। कर्मचारी छुट्टी से खुश और दफ्तर फाइलों में दर्ज “बीमार” कर्मचारियों से खुश। इसलिए आज के दौर का नया सूत्र वाक्य शायद यही है— “न खाता, न बही… मेडिकल बोले वही सही!”

नोट: यह लेख केवल हास्य-व्यंग्य के उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, डॉक्टर या संस्था की छवि धूमिल करना नहीं है।

Mahesh soni

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