साधना का लक्ष्य परमपुरुष के साथ एकत्व की अनुभूति प्राप्त करना है- आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत

देवास। आनंद मार्ग प्रचारक संघ का तीन दिवसीय विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन आनंद नगर पुरुलिया में चल रहा है।
इस अवसर पर संघ के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने उपस्थित साधकों एवं भक्तों को संबोधित करते हुए ईश्वर और जीव विषय की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि परमपुरुष क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा परे हैं। संबंधित खबर पढ़ें ब्रह्मप्राप्ति ही एकमात्र पथ, साधना से आत्मा के नियंत्रण में आता है मन

उन्होंने योगदर्शन के सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि ईश्वर अथवा परमपुरुष वह पुरुषविशेष सत्ता है जो क्लेश (मानसिक विकार), कर्म (क्रिया), विपाक (कर्मफल) तथा आशय (संस्कारों के बीज) से कभी प्रभावित नहीं होती। इसके विपरीत संसार का प्रत्येक जीव इन बंधनों के प्रभाव में रहता है। यह भी पढ़ें: मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं, फल परम सत्ता के हाथ में है
उक्त जानकारी देते हुए आनन्द मार्ग प्रचारक संघ देवास के हेमेन्द्र निगम काकू ने बताया कि अपने प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि क्लेश वह तत्व है जो मन की स्वाभाविक शांति और संतुलन को भंग कर देता है। जीव-जगत में विभिन्न प्रकार की वृत्तियां कार्य करती हैं, जिनके कारण मनुष्य सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा कर्मफल का अनुभव करता है। संबंधित खबर: विश्वस्तरीय आनंदमार्ग धर्म महासम्मेलन में हेमेन्द्र निगम काकू सम्मानित
उन्होंने चार प्रमुख वृत्तियों का वर्णन किया- क्लिष्टवृत्ति -जिसका प्रारम्भ और परिणाम दोनों दुःखद होते हैं।
क्लिष्ट-अक्लिष्टवृत्ति -जिसमें प्रारम्भ में कष्ट होता है, किन्तु अंततः सुख और कल्याण प्राप्त होता है।
अक्लिष्ट-क्लिष्टवृत्ति – जो आरम्भ में सुखद प्रतीत होती है, परन्तु अंत में दुःख का कारण बनती है।
अक्लिष्टवृत्ति -जिसका प्रारम्भ और परिणाम दोनों ही शांति, सुख तथा कल्याणकारी होते हैं।
पुरोधा प्रमुख ने कहा कि प्रथम तीन वृत्तियां जीवों को प्रभावित करती हैं, जबकि अक्लिष्टवृत्ति ही ऐसी अवस्था है जो साधक को परमपुरुष के निकट ले जाती है। आध्यात्मिक साधना का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को क्लेशों, कर्मबंधनों और संस्कारों की सीमाओं से ऊपर उठाकर उस दिव्य चेतना की ओर अग्रसर करना है जहाँ शांति, आनन्द और परम एकत्व का अनुभव होता है।
उन्होंने उपस्थित साधकों का आह्वान किया कि वे नियमित साधना, सदाचार, सेवा तथा ईश्वर-प्रणिधान के माध्यम से अपने जीवन को अक्लिष्टवृत्ति की दिशा में विकसित करें। ऐसा करने से वे कर्मबंधन से मुक्त होकर परमपुरुष की अनन्त करुणा, प्रेम और आनन्द का अनुभव कर सकेंगे। यह भी पढ़ें- साधना और सेवा का लक्ष्य परम पुरुष की प्रसन्नता ही है
अपने उद्बोधन के समापन में उन्होंने कहा-साधना का लक्ष्य केवल दुःखों से मुक्ति नहीं, बल्कि क्लेश, कर्म, विपाक और आशय की सीमाओं का अतिक्रमण कर परमपुरुष के साथ अखण्ड एकत्व की अनुभूति प्राप्त करना है।




