पथरीली जमीन पर सीताफल की खेती बनी किसानों की कमाई का जरिया
बागड़ के लिए लगाए थे पौधे, अब हर साल हो रही अतिरिक्त आय; कम लागत में मिल रहा बेहतर मुनाफा

बेहरी (हीरालाल गोस्वामी)। जिस पथरीली जमीन पर दूसरी फसलें उगाना मुश्किल होता है, उसी जमीन पर लगे सीताफल के पेड़ अब आदिवासी किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं।
कभी खेतों की बागड़ के रूप में लगाए गए ये पौधे आज फल देकर किसानों को अतिरिक्त आमदनी दे रहे हैं। कम लागत और सीमित देखभाल में होने वाली इस पैदावार ने किसानों को कमाई का ऐसा साधन दिया है, जिससे वे सोयाबीन और गेहूं जैसी परंपरागत फसलों के साथ अपनी आय भी बढ़ा रहे हैं।
बेहरी क्षेत्र में सीताफल की बहार आई हुई है। पेड़ों पर लदे फल किसानों के लिए खुशियां लेकर आए हैं। किसानों का कहना है कि जिन पौधों को कभी खेतों की सुरक्षा के लिए लगाया था, आज वही उनकी आमदनी का जरिया बन गए हैं।
पंचायत से मिले पौधों ने बदली कमाई की तस्वीर-
ग्राम पंचायत में हरियाली महोत्सव के दौरान करीब दो दर्जन किसानों को सीताफल के पौधे उपलब्ध कराए गए थे। उस समय तत्कालीन सरपंचों ने किसानों से कहा था कि पौधे लगा लो, जब ये बड़े होकर फल देने लगेंगे तो हमें जिंदगीभर याद करोगे। समय के साथ उनकी यह बात सच साबित होने लगी।
किसानों ने पंचायत से मिले पौधों को अपने खेतों के आसपास पथरीली जमीन में गड्ढे खोदकर बागड़ के रूप में लगा दिया। उचित मौसम और पानी मिलने से पौधे धीरे-धीरे बड़े होने लगे। करीब पांच साल बाद इनमें फल आने लगे और किसानों को इनसे आमदनी मिलने लगी। लगाए गए पौधों में से लगभग 80 प्रतिशत पौधे जीवित रहकर पेड़ बन गए।
बाजार में 50 से 60 रुपये किलो तक मिल रहा भाव-
सीताफल के पेड़ों पर इन दिनों अच्छी पैदावार दिखाई दे रही है। बाजार में सीताफल का भाव 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा है। किसानों को उम्मीद है कि इस बार पेड़ों से मिलने वाले फल बेचकर अच्छी कमाई होगी।
पिछले वर्ष एक किसान ने इन्हीं पेड़ों से करीब 35 हजार रुपये के सीताफल बेचे थे। इस बार भी पैदावार को देखते हुए हजारों रुपये की बिक्री होने की संभावना है। किसानों के लिए खास बात यह है कि इसके लिए अलग से खेत तैयार करने, नियमित बुवाई करने या दूसरी फसलों की तरह अधिक खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती।
पशु नहीं खाते पौधे, इसलिए बागड़ के लिए भी उपयोगी-
सीताफल के पौधे लगाने के पीछे किसानों का एक व्यावहारिक उद्देश्य भी था। गाय, भैंस, बकरी जैसे पालतू पशु सामान्य तौर पर इसकी पत्तियां नहीं खाते। इस वजह से खेतों की मेड़ या बागड़ के आसपास लगाए गए पौधों के सुरक्षित रहने की संभावना रहती है।
पथरीली जमीन पर भी इन पौधों के पनप जाने से किसानों को ऐसी जमीन का उपयोग करने का अवसर मिला, जहां दूसरी फसलों से अच्छी आमदनी लेना आसान नहीं है। अब यही पेड़ खेतों की सीमा तय करने के साथ फल भी दे रहे हैं।
बेहरी क्षेत्र में कैलाश महाराज, रमेश बागवान, बलराम बागेश्वर, गंगाराम वास्केल, प्रताप बछानिया, रूपसिंह बागवान, चंदन सिंह राठौर और उमेन सिंह डोडावे सहित अन्य किसानों के यहां सीताफल की पैदावार हो रही है।
पकने से पहले तोड़कर रखना पड़ता है फल-
सीताफल की बिक्री में एक खास सावधानी भी रखनी पड़ती है। फल को पेड़ से तोड़ने के बाद पकने के लिए कुछ समय तक अलग रखना पड़ता है। सामान्य तौर पर दो से तीन दिन में फल पकने की स्थिति में आ जाता है। इसी वजह से किसान एक साथ पूरी पैदावार तोड़ने के बजाय जरूरत और पकने की स्थिति के अनुसार फल निकालते हैं।
किसान गंगाराम वास्केल ने बताया कि वे प्रत्येक पेड़ से फल अलग-अलग तोड़कर उन्हें पकने के लिए रखते हैं। इससे सभी फल एक साथ नहीं पकते और बिक्री करना आसान रहता है। साथ ही फल खराब होने की आशंका भी कम रहती है।
उनके अनुसार, सीताफल की बहार करीब 20 दिन तक चलती है। अब तक वे 10 हजार रुपये से अधिक के फल बेच चुके हैं। पूरी पैदावार बिकने पर 30 हजार रुपये से अधिक की बिक्री होने की उम्मीद है।
छह बीघा में सोयाबीन-गेहूं से भी बेहतर लग रही कमाई-
गंगाराम वास्केल का कहना है कि छह बीघा जमीन में सोयाबीन और गेहूं की फसल लेने पर भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती, जितनी सीताफल के पेड़ों से मिल रही है। सीताफल के लिए अतिरिक्त खर्च बहुत कम है, जबकि फल बेचने से सीधे आमदनी हो रही है। यही वजह है कि वे और प्रताप बछानिया जैसे किसान इस अतिरिक्त कमाई से खुश हैं।
हालांकि, वास्तविक मुनाफा पैदावार, बाजार भाव और देखभाल पर निर्भर करता है, लेकिन इन किसानों का अनुभव बताता है कि खेतों की अनुपयोगी पड़ी जमीन का सही इस्तेमाल करके भी आमदनी का नया रास्ता बनाया जा सकता है।
उद्यानिकी विभाग भी पौधे लगाने में कर सकता है मदद-
उद्यानिकी विभाग के सबडिवीजन प्रबंधक राकेश सिंह सोलंकी ने बताया कि क्षेत्र के किसान आवेदन करते हैं तो विभाग की ओर से उनके खेतों में सीताफल के पौधे लगाने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे किसानों को फल उत्पादन के जरिए अपनी आय बढ़ाने का अवसर मिलेगा और वे धीरे-धीरे कृषि संसाधन भी जुटा सकेंगे।
उन्होंने बताया कि किसान प्रयास करें तो ड्रिप सिंचाई योजना के तहत सब्सिडी का लाभ भी मिल सकता है। इससे पौधों को पानी देने की व्यवस्था बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
बेहरी क्षेत्र के किसानों का अनुभव बताता है कि हर जमीन पर परंपरागत फसलें ही कमाई का एकमात्र विकल्प नहीं हैं। पथरीली जमीन पर बागड़ के लिए लगाए गए सीताफल के पेड़ अब आर्थिक सहारा बन रहे हैं। यदि इस तरह के प्रयासों को उचित मार्गदर्शन और बाजार की सुविधा मिले, तो कम लागत में अतिरिक्त आय हासिल करने के अवसर बढ़ सकते हैं।
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