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आज की बात: आईबी के गुमनाम प्रहरी, जिनकी पहचान कभी सामने नहीं आती

1985 की यात्रा का संस्मरण, जिसने खुफिया एजेंसियों के अदृश्य योगदान को करीब से देखने का अवसर दिया

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“देश की रक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिक ही नहीं करते, बल्कि वे गुमनाम प्रहरी भी करते हैं, जिनका चेहरा कभी दुनिया के सामने नहीं आता।”

भारत सरकार की इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) देश की सबसे महत्वपूर्ण खुफिया संस्थाओं में से एक है। आतंकवाद, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों तथा आंतरिक सुरक्षा से जुड़े खतरों पर सतत निगरानी रखना इसका प्रमुख दायित्व है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके अधिकांश अधिकारी गुमनाम रहकर कार्य करते हैं। देश उनकी सेवाओं का लाभ तो उठाता है, पर उनके नाम और चेहरे शायद ही कभी सामने आते हैं।

यह घटना वर्ष 1985 की है।

अचानक मेरा और श्रीमती जी का माता वैष्णो देवी तथा कश्मीर भ्रमण का कार्यक्रम बन गया। कार्यालय से अवकाश भी मिल गया और हम ट्रेन से जम्मू के लिए रवाना हो गए। सेकेंड क्लास के डिब्बे में हमारे साथ कुछ परिवार और कुछ उत्साही युवा भी यात्रा कर रहे थे।

दिल्ली से ट्रेन आगे बढ़ी ही थी कि यात्रियों के बीच चर्चा शुरू हो गई। उस वर्ष बैसाखी के अवसर पर खालिस्तान समर्थक उग्रवादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा और कत्लेआम की धमकी दे रखी थी। संयोग से हमारी ट्रेन बैसाखी के दिन ही पंजाब से होकर गुजरने वाली थी। स्वाभाविक था कि पूरे डिब्बे में चिंता और आशंका का वातावरण बन गया।

हमारी बेचैनी देखकर साथ बैठे एक सिख युवक ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाई साहब, बिल्कुल चिंता मत कीजिए। जब तक हम आपके साथ हैं, आपका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।”

बातों-बातों में उसने पूछा, “क्या आप शिवपुरी नेशनल पार्क में पदस्थ हैं?”

मेरे “हाँ” कहते ही उसने धीमे स्वर में बताया कि वे सभी इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी हैं और शिवपुरी में प्रशिक्षण पूरा करके लौट रहे हैं।

बस, इतना सुनना था कि जैसे पूरे डिब्बे का भय दूर हो गया। जम्मू पहुँचते-पहुँचते हम सब एक परिवार की तरह घुल-मिल चुके थे। विदा लेते समय उसने अपना नाम “हरविंदर सिंह” बताया—यहाँ मैं उसकी वास्तविक पहचान सुरक्षित रखने के लिए काल्पनिक नाम का प्रयोग कर रहा हूँ। उसने आग्रहपूर्वक कहा, “श्रीनगर आइए तो मेरे घर अवश्य आइए।”

रात्रि लगभग ग्यारह बजे हम जम्मू पहुँचे, जहाँ मेरे बैचमेट श्री सूरज शर्मा ने अपने घर पर हमारा स्नेहपूर्वक स्वागत किया। कुछ घंटे विश्राम करने के बाद हम कटरा पहुँचे और मध्यरात्रि में पैदल यात्रा प्रारंभ कर माता वैष्णो देवी भवन पहुँच गए।

दर्शनार्थियों की भीड़ इतनी अधिक थी कि बताया गया, दर्शन अगले दिन प्रातः दस बजे के बाद ही संभव होंगे। मैंने वहाँ ड्यूटी पर तैनात एक सैनिक से निवेदन किया कि मैं मध्य प्रदेश के महार क्षेत्र से आया हूँ। उसने अत्यंत आत्मीयता से हमारी सहायता की और शीघ्र ही माता के दर्शन करा दिए। दर्शन के बाद हम तत्काल लौट पड़े और अगले दिन दोपहर तक फिर जम्मू पहुँच गए।

अगले दिन बस से श्रीनगर पहुँचे। होटल में कमरा लेने के बाद सबसे पहले हरविंदर को फोन किया। पहले तो उसने हल्की नाराज़गी जताई कि होटल में क्यों रुके, सीधे घर क्यों नहीं आए। थोड़ी ही देर बाद वह स्वयं होटल आ गया।

उसने बड़े आग्रह से हमें अपने घर चलने को कहा। हमने संकोचवश मना किया तो वह मुस्कराकर बोला, “लगता है आप लोग सरदार होने के कारण मेरे घर नहीं आना चाहते।”
उसकी यह बात सीधे दिल में उतर गई। अगले दिन हम उसके लाल चौक स्थित घर पहुँचे। उसके परिवार ने जिस आत्मीयता और स्नेह से हमारा स्वागत किया, वह आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।‎

बातचीत के दौरान उसका छोटा भाई, जो आठवीं कक्षा का छात्र था, उस समय के उग्र माहौल से प्रभावित होकर खालिस्तान समर्थक बातें करने लगा। मैंने उसे समझाया कि हिंसा और अलगाव कभी किसी समाज या राष्ट्र का भला नहीं कर सकते।

इसी बीच हरविंदर ने अपने कार्य की वास्तविकता बताई। उसने कहा कि कश्मीर में आईबी के अधिकारी के रूप में काम करना हर पल मौत के साये में जीने जैसा है। यदि किसी को उसकी वास्तविक पहचान का आभास भी हो जाए, तो जीवित बचना कठिन हो सकता है। इसलिए वह कोई भी महत्वपूर्ण बात कभी लिखता नहीं था। हर सूचना उसे अपनी स्मृति में ही सुरक्षित रखनी पड़ती थी। लोगों के बीच वह स्वयं को बेरोज़गार या छोटे-मोटे काम करने वाला व्यक्ति बताता था, ताकि किसी को उस पर संदेह न हो।

उसकी बातें सुनकर हम स्तब्ध रह गए। मन गर्व से भर उठा कि मेरा यह भाई बिना किसी पहचान, बिना किसी सम्मान और बिना किसी प्रचार के, अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर मातृभूमि की सेवा में लगा हुआ है।

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अपने पूरे सेवाकाल में जहाँ-जहाँ मेरी नियुक्ति रही, वहाँ पुलिस के साथ-साथ आईबी के अधिकारियों का भी मुझे भरपूर सहयोग मिला। उनकी सटीक और समय पर प्राप्त सूचनाओं ने अनेक वन्यजीव अपराधियों को पकड़ने और कई महत्वपूर्ण मामलों का सफलतापूर्वक खुलासा करने में मेरी बहुत सहायता की।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिकों के साहस से ही नहीं, बल्कि उन अनगिनत गुमनाम आईबी अधिकारियों के त्याग, सतर्कता और समर्पण से भी सुनिश्चित होती है, जो अपनी पहचान छिपाकर, हर दिन जोखिम उठाकर राष्ट्र की रक्षा करते हैं।

हम उन्हें शायद कभी पहचान न पाएँ, पर उनका ऋण इस देश का प्रत्येक नागरिक सदैव स्वीकार करेगा। 

जय हिंद… अशोक बरोनिया

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