धर्म-अध्यात्म

भगवान का प्रकाश जीवन से अज्ञान मिटाता है, युवा अपनाएं संस्कार और अनुशासन: देवकीनंदन ठाकुर महाराज

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उदयनगर (बाबू हनवाल)। जब श्री राम ने अवतार लिया, तब वे सामान्य बालकों की तरह रोए नहीं। तब माता कौशल्या ने उनसे प्रार्थना की, कि वे बाल रूप में व्यवहार करें। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर अपनी लीला से भक्तों को स्नेह और अपनत्व का अनुभव कराते हैं।

यह विचार श्री राम कथा में देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो लोग सच्चे मन से भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं, उनके जीवन में अशुभ का स्थान नहीं रहता। उनके साथ जो भी होता है, वह अंततः कल्याणकारी और शुभ ही सिद्ध होता है।

उन्होंने कहा, कि जब भगवान श्रीराम ने अवतार लिया, तब प्रकृति भी उस दिव्य क्षण की साक्षी बन गई। उनके जन्म के बाद पूरे एक माह तक सूर्य अस्त नहीं हुआ—चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश छाया रहा। सूर्य का निरंतर प्रकाश इस बात का संकेत था कि अब अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना निश्चित है। यह प्रसंग हमें यह संदेश देता है कि जब हमारे जीवन में भगवान का प्रकाश आता है, तो अज्ञान और दुख रूपी अंधकार स्वतः दूर हो जाता है, और जीवन में सुख, शांति तथा सही मार्ग का उदय होता है। उन्होंने कहा, कि आज का युवा यदि संयम, अनुशासन और संस्कारों के साथ जीवन जीने का संकल्प ले, तो न केवल उसका स्वयं का भविष्य उज्ज्वल होगा, बल्कि परिवार में सुख-शांति और पूरे राष्ट्र में प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

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महाराज श्री ने कहा कि गो माता को ‘राष्ट्र माता’ घोषित किए जाने की मांग को लेकर जागरूकता और आंदोलन किए जा रहे हैं। ऐसे पुण्य कार्य में हम सभी को भी आगे बढ़कर भाग लेना चाहिए और अपनी आस्था की आवाज़ को सशक्त बनाना चाहिए। गौ माता की सेवा और रक्षा करना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारा परम धर्म और सनातन संस्कृति की पहचान है। जब तक हम अपनी जड़ों और मूल्यों की रक्षा नहीं करेंगे, तब तक समाज और राष्ट्र की सच्ची उन्नति संभव नहीं है।

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