बलूचिस्तान: उपेक्षा की जमीन से उठती स्वतंत्रता की आग

Balochistan पाकिस्तान के चार प्रांतों में सबसे बड़ा, लेकिन सबसे उपेक्षित प्रांत है बलूचिस्तान। यह भूभाग न सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। बावजूद इसके, यह इलाका दशकों से शोषण, उपेक्षा और सैन्य दमन का शिकार रहा है, जिसके चलते वहां की आवाम आजादी की मांग कर रही है। बलूच राष्ट्रवाद की आवाजें अब सिर्फ अंदर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठने लगी हैं।
बलूचिस्तान सिर्फ एक प्रांत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है। वहां के लोग दशकों से अपने अधिकारों, सम्मान और पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर पाकिस्तान सरकार समय रहते बलूच लोगों को न्याय, भागीदारी और स्वायत्तता नहीं देती, तो यह संघर्ष और तेज हो सकता है। बलूचिस्तान की कहानी सिर्फ पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की स्थिरता और भविष्य का भी संकेतक है।
भौगोलिक स्थिति और क्षेत्रफल
कुल क्षेत्रफल: लगभग 347,190 वर्ग किलोमीटर (पाकिस्तान का लगभग 44%)
सीमाएं: बलूचिस्तान की सीमाएं ईरान, अफगानिस्तान और अरब सागर से लगती हैं।
महत्वपूर्ण बंदरगाह: ग्वादर, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का प्रमुख केंद्र है। यहां की जलवायु शुष्क है और भूमि पठारी व रेगिस्तानी है।
जनसंख्या और जातीय संरचना- जनसंख्या घनत्व कम है, और अधिकतर लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं।
अनुमानित जनसंख्या: 1.2 से 1.5 करोड़।
जातीय समूह: बलूच, ब्रहुई, पश्तून।
प्रमुख भाषाएं: बलूची, ब्रहुई, पश्तो, उर्दू।
बलूचिस्तान का इतिहास-
बलूचिस्तान का इतिहास बहुत पुराना है। यह इलाका सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही आबाद रहा है। यहां पर मेहरगढ़ नामक पुरातात्विक स्थल विश्व की सबसे पुरानी कृषि सभ्यताओं में से एक है। इस क्षेत्र पर समय-समय पर विभिन्न मुस्लिम शासकों और मंगोलों का प्रभाव रहा। यहां की जनजातियां स्वतंत्र रूप से अपने क्षेत्रों में शासन करती थीं। 17वीं शताब्दी से बलूचिस्तान एक संगठित राज्य के रूप में उभरा, जिसका शासक ‘खान ऑफ कलात’ कहलाता था। यह राज्य ईरान और अफगानिस्तान से लेकर कराची के पास तक फैला हुआ था। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने बलूचिस्तान के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण कर लिया, लेकिन कलात की रियासत को एक अर्ध-स्वायत्त रियासत के रूप में मान्यता दी।
1947 के बाद का घटनाक्रम:
जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब कलात रियासत ने पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया। 11 अगस्त 1947 को कलात ने खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया। लेकिन मार्च 1948 में पाकिस्तान ने बलपूर्वक कलात को अपने में मिला लिया। इसी के साथ बलूच स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत हुई, जो आज तक अलग-अलग रूपों में जारी है।
खनिज और आर्थिक संसाधन
बलूचिस्तान को पाकिस्तान का “खनिज भंडार” माना जाता है। यहां से मिलने वाले प्रमुख खनिज:
प्राकृतिक गैस: सुई गैस फील्ड पाकिस्तान की सबसे बड़ी गैस परियोजना है।
तांबा और सोना: रेको डिक क्षेत्र विश्व के बड़े खनिज क्षेत्रों में शामिल है। कोयला, लोहा, संगमरमर, क्रोमाइट, यूरेनियम। अरब सागर में मत्स्य संसाधन और बंदरगाह व्यापार की अपार संभावनाएं हैं।
बलूच आज़ादी की मांग और संघर्ष के कारण-
ऐतिहासिक असहमति: बलूच जनता का मानना है कि उनका पाकिस्तान में जबरन विलय हुआ था।
राजनीतिक उपेक्षा: प्रांत को हमेशा राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया।
आर्थिक शोषण: क्षेत्र के संसाधनों से पाकिस्तान को फायदा होता है, लेकिन बलूच जनता को नहीं।
सांस्कृतिक दमन: बलूच संस्कृति, भाषा और परंपराओं को दबाने की कोशिशें की गईं।
मानवाधिकार हनन: बलूच नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं, जबरन गायब किए गए लोगों की बढ़ती संख्या, पाकिस्तान सेना की बर्बर कार्रवाइयां।
क्या बलूचिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बन सकता है?
सैद्धांतिक रूप से संभव, लेकिन व्यावहारिक बाधाएं:
– पाकिस्तानी सेना का अत्यधिक नियंत्रण।
– अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी।
– क्षेत्रीय राजनीति और चीन-पाक प्रोजेक्ट्स (CPEC) के कारण जटिलता।
– बलूच आंदोलन में भी संगठनात्मक एकता की कमी।




