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मोबाइल की होली: आभासी दुनिया में गुम होती परंपराएं

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आज की बात…

यहां लंदन में मैंने अनुभव किया है कि लोगबाग मोबाइल का काफी कम उपयोग करते हैं। पार्क में, वॉक करते समय या लाइब्रेरी में कभी किसी को मोबाइल उपयोग करते नहीं देखा। लोगबाग आपस में ज्यादातर बातें करते ही मिले।

इसके विपरीत मुझे भोपाल का एक बार का वाक्या याद आ रहा है। मैं डीबी मॉल गया हुआ था। तब करीब 50 से अधिक लड़के लड़कियां बाहर सीड़ीनुमा फर्स पर बैठे थे। लेकिन आश्चर्य की बात कि वे आपस में बात नहीं कर रहे थे। बल्कि सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त थे। यह तब था जब सभी लड़के लड़कियां किसी एक ग्रुप का ही हिस्सा थे।

यही स्थिति सभी त्योहारों पर आजकल बनी हुई है। अब तो होली पर भी अधिकांश लोग केवल मोबाइल पर होली का त्योहार मना रहे हैं तो कुछ लोग टीवी पर देखते हुए मना रहे हैं परंतु वास्तविक रूप से होली खेल नहीं रहे। केवल अपनी पोस्ट मोबाइल पर पोस्ट कर रहे हैं। सच है कि मोबाइल ने हमारी परंपराएं हमसे छीन ली हैं।

लोग आजकल आपस में बातचीत नहीं कर रहे हैं, मिलजुल नहीं रहे, केवल अपनी पोस्ट डाल रहे हैं और फेसबुक व्हाट्सएप इंस्टाग्राम पर जीवन बिता रहे हैं। भूल जाते हैं कि यह वास्तविक जिंदगी नहीं है यह आभासी जिंदगी है। आभासी जिंदगी हमेशा शारीरिक तथा मानसिक रोगों का कारण बनती है। इसलिए आभासी जिंदगी से दूर रहकर वास्तविक जिंदगी का आनंद हमें हमेशा लेना चाहिए।
यहाँ लंदन से सभी को होली की बारंबार बधाई और शुभकामनाएं!
14 मार्च 2025 जय हिंद

Ashok baroniya

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