सांस हटते ही चींटी हो या हाथी, कोई अपना बोझ नहीं संभाल पाता: सद्गुरु मंगल नाम साहेब

‘मैं’ का अहंकार इंसान को भारी बनाता है, झूठी प्रशंसा और चापलूसी विनाश का कारण बनती है
देवास। बालगढ़ चूना खदान स्थित सद्गुरु कबीर सर्वहारा प्रार्थना स्थली पर आयोजित गुरु वाणी पाठ एवं गुरु-शिष्य संवाद में सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने जीवन, अहंकार और मनुष्य के भीतर छिपे ‘मैं’ के भाव को लेकर विचार रखे। उन्होंने कहा कि श्वास स्वयं हल्की होकर भी जीवन के करोड़ों शरीरों का बोझ निरंतर संभाल रही है, लेकिन श्वास के रुकते ही शरीर चाहे चींटी का हो या हाथी का, अपना भार स्वयं नहीं उठा पाता।
सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने कहा कि श्वास 24 घंटे निरंतर चलती रहती है और उस पर रत्तीभर भी बोझ नहीं होता। उन्होंने चींटी का उदाहरण देते हुए कहा कि उसे पहाड़ से गिरा दिया जाए, तब भी वह सामान्यतः चोट से बच जाती है, क्योंकि उसका शरीर हल्का है। इसके विपरीत जब श्वास ही शरीर से हट जाती है तो विशाल हाथी भी अपने शरीर का बोझ संभाल नहीं पाता।
उन्होंने कहा कि संसार में व्यक्ति सुख पाने की होड़ और दिखावे के बीच स्वयं पर तरह-तरह के बोझ लादता जाता है। ‘मैं सेठ हूं’, ‘मैं साहूकार हूं’, ‘मैं मंत्री हूं’, ‘मैं अधिकारी हूं’ और ‘मैं धनवान हूं’ जैसे भाव व्यक्ति के लिए बोझ बन जाते हैं। जब इन बोझों को उतार दिया जाता है तो इंसान स्वयं को हल्का महसूस करता है।
‘मैं’ के अहंकार को विनाश का कारण बताते हुए सद्गुरु ने रावण का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि रावण अपने अहंकार के कारण अपनों से भी बैर करता रहा। उसके भाई विभीषण ने भी उसका साथ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि रावण का ‘मैं’ लगातार बढ़ता जा रहा था। वह झूठी प्रशंसा और चापलूसी के बीच अपने अहंकार को पालता रहा।
सद्गुरु मंगल नाम साहेब ने कहा कि झूठी प्रशंसा व्यक्ति के विनाश का कारण बन सकती है। उन्होंने रावण के संदर्भ में कहा कि उसने 14 चौकड़ी तक राज किया और उसके सामने से 14 बार कलियुग निकल गया। उन्होंने बताया कि एक चौकड़ी 43 लाख 20 हजार वर्ष की मानी जाती है। उनके कथन के अनुसार रावण करीब 6 करोड़ वर्ष तक ‘मैं’ के सिंहासन पर बैठा रहा, लेकिन वह यह नहीं समझ पाया कि वही तत्व उसके भीतर भी है और दूसरों के भीतर भी।
उन्होंने कहा कि केवल अपनी तरफ खड़े होकर ‘मैं’ को जीतने का प्रयास पर्याप्त नहीं है। ‘मैं’ को समझना है तो उसके भीतर और अपने भीतर समाए उस भाव को समझना होगा। विभीषण ने तत्काल यह समझ लिया था कि वही तत्व सबमें समाया हुआ है।
सद्गुरु ने कहा कि रावण को लंबे समय बाद समझ आया कि वह ‘मैं’ के अहंकार और झूठी प्रशंसा के बीच अपने अहंकार को पालता रहा। चापलूसों और चुगलखोरों से घिरे व्यक्ति के लिए वास्तविकता को समझना कठिन हो जाता है। इसलिए मनुष्य को स्वयं के भीतर झांककर अपने अहंकार को पहचानना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान साध संगत ने सद्गुरु मंगल नाम साहेब की आरती की तथा उनके आशीर्वचन लिए। कार्यक्रम की जानकारी सेवक वीरेंद्र चौहान ने दी।



