स्वास्थ्य

प्रदूषण केवल फेफड़ों ही नहीं, शरीर के अन्य अंगों को भी करता है प्रभावित

500 से अधिक विशेषज्ञों ने एलर्जी, अस्थमा और आधुनिक उपचार पर किया मंथन

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देवास/इंदौर। इंडियन कॉलेज ऑफ एलर्जी, एस्थमा एंड एप्लाइड इम्यूनोलॉजी एवं अमलतास यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वावधान में चार दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हुआ। सम्मेलन में देशभर से 500 से अधिक विशेषज्ञ चिकित्सक, शोधार्थी एवं चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में एलर्जी, अस्थमा, वायु प्रदूषण, आधुनिक जांच तकनीक और उपचार के नवीनतम तरीकों पर विशेषज्ञों ने विचार-विमर्श किया।

समापन समारोह में अमलतास ग्रुप के संस्थापक सुरेशसिंह भदौरिया ने सम्मेलन में पधारे पद्मश्री डॉ. दिगंबर बेहरा, पद्मश्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आईसीएएआई अध्यक्ष डॉ. सुरेश कूलवाल तथा सचिव डॉ. राज कुमार सहित केंद्रीय वैज्ञानिक एवं कार्यकारिणी समिति के वरिष्ठ विशेषज्ञों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। इसके बाद सम्मेलन की स्मारिका का विमोचन किया। कार्यक्रम में अमलतास यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. आरके सिंह तथा कॉलेज डीन डॉ. एके पीठवा मौजूद रहे। आयोजन अमलतास एजुकेशन सोसायटी के चेयरमैन मयंक राज सिंह भदौरिया के मार्गदर्शन में किया गया।

प्रदूषण सालभर की समस्या, केवल दिल्ली तक सीमित नहीं-
सम्मेलन में वायु प्रदूषण पर चर्चा करते हुए मेदांता हॉस्पिटल से डॉ. अरविंद कुमार ने कहा कि देश का 58 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र प्रदूषण से प्रभावित है। प्रदूषण को केवल दिल्ली या उत्तर भारत की समस्या मानना उचित नहीं है। पिछले वर्ष कई अवसरों पर मुंबई की एयर क्वालिटी भी दिल्ली से खराब रही। उन्होंने कहा कि प्रदूषण अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे वर्ष स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली समस्या है। प्रदूषित हवा का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रदूषक रक्त के माध्यम से शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं। गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशु पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

सचिव डॉ राजकुमार ने कहा कि सांस की हर बीमारी एलर्जी नहीं होती हैं। उत्तर भारत की तुलना में फिलहाल इंदौर की स्थिति बेहतर है। ऑर्गनाइजेशन चेयरमैन डॉ. सलिल भार्गव ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य एयर पॉल्यूशन सहित उन कारणों पर चर्चा करना था, जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने और एलर्जी बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण और एलर्जी के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए जागरूकता और रोकथाम पर जोर देना जरूरी है।

ऑर्गनाइजेशन सेक्रेटरी डॉ. अभय गुप्ता ने बताया कि विशेष कार्यशाला में एलर्जी की पहचान, जांच और उपचार की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि 60वें राष्ट्रीय सम्मेलन को इंदौर में अमलतास यूनिवर्सिटी के साथ आयोजित करना गौरव का विषय है। सम्मेलन का उद्देश्य देश-दुनिया के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और युवा शोधकर्ताओं को एक मंच उपलब्ध कराना था, जहां अस्थमा एवं एलर्जी के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम शोध, जांच तकनीकों और उपचार के व्यावहारिक अनुभवों का आदान-प्रदान हो सके। जयपुर के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. सुरेश कूलवाल को एलर्जी एवं श्वसन चिकित्सा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

आमजन से विशेषज्ञों ने किया सीधा संवाद-
विशेष जन-जागरूकता सत्र में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने आमजन से सीधे संवाद करते हुए एलर्जी, अस्थमा, त्वचा, फूड एवं ड्रग एलर्जी तथा मौसमी एलर्जी से जुड़े सवालों के जवाब दिए। बदलते मौसम, धूल, परागकण, डस्ट माइट्स, खान-पान और दवाओं से होने वाली एलर्जी से बचाव के उपाय भी बताए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि एलर्जी के लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह और उचित जांच कराना जरूरी है।

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