भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आंसुओं से मित्र सुदामा के चरण धोकर उनके दुखों को मिटा दिया
देवास। मित्रता हो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी। भगवान श्रीकृष्ण ने मित्र सुदामा के अपने आंसुओं से चरण धो डाले। मित्र सुदामा के दीनहीन होने के बाद भी भगवान श्रीकृष्ण ने कभी भेद नहीं किया। कितनी ही विपदाएं आई लेकिन अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण को सुदामा ने कभी अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं किया।
यह विचार श्रीमद् भागवत कथा के विश्राम अवसर पर व्यासपीठ से भागवत भूषण आचार्य पं. आशुतोष शास्त्री ने व्यक्त किए। पं. शास्त्री ने श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता का वर्णन करते हुए कहा, कि सुदामाजी और भगवान श्रीकृष्ण बचपन में गुरुकुल में साथ-साथ पढ़ने जाते थे। इस दौरान चोर का चुराया हुआ चना आश्रम में छोड़ जाते हैं, वह चना गुरु माता सुदामाजी को देती हैं। सुदामा और कृष्ण दोनों वन में जाते हैं लकड़ी लेने। उस समय सुदामाजी वह चने खा लेते हैं। चुराए हुए अन्न को खाने से सुदामाजी को श्राप लगता है, कि जो भी चुराए हुए चने खाएगा वह पूरे जीवन गरीब रहेगा। तब भगवान कृष्ण आंसू बहाते हैं, कि मेरे मित्र मुझे श्राप नहीं लगे इसलिए अकेले ही चने खा लिए। फिर भगवान कृपा करते हैं और सुदामाजी के चरणों को अपने आंसुओं से धोते हैं। वह उनके दुख मिटा देते हैं। उनके श्राप को खत्म कर देते हैं। सुदामाजी द्वारा लाए गए चावल को खाकर तीनों लोकों की संपत्ति प्रदान कर देते हैं। जीवन में मित्रता हो तो सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण जैसी हो।
इस दौरान पं. शास्त्री ने मेरे यार सुदामा रे तू घणा दीना में आयो… जैसे एक से बढ़कर एक भक्ति गीतों की संगीतमय प्रस्तुति दी तो श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमने लगे। पं. शास्त्री का महिला मंडल ने शाल-श्रीफल भेंट कर सम्मान किया। महिला मंडल एवं धर्मप्रेमियों ने व्यासपीठ की पूजा-अर्चना कर महाआरती की। धर्मप्रेमियों ने कथा श्रवण कर धर्म लाभ लिया।
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